Tuesday, 7 July 2015

आसान नहीं मेक इन इंडिया की राह

आसान नहीं मेक इन इंडिया की राह

प्रधानमंत्री मोदी की मेक इन इंडिया योजना कुछ रंग लाती दिख रही है। बीते समय में कम से कम पांच बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में स्मार्ट फोन बनाने की मंशा व्यक्त की है। इनमे सोनीए लेनोवोए एप्पल जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। यूरोप की हवाई जहाज बनाने वाली प्रमुख कंपनी एयरबस ने भी ऐसी मंशा जताई है। इसके विपरीत माइक्रोसाफ्ट ने फिलहाल हाथ खींच रखे हैं। ध्यान देने की बात यह भी है कि दिलचस्पी लेने वाली कंपनियों में अधिकतर स्मार्ट फोन निर्माता हैं। दूसरे उद्योग जैसे स्टीलए मेडिकल सामग्रीए इलेक्ट्रिकल स्विचगेयरए दवाएंए चाकलेट आदि के निर्माताओं में उदासी बनी हुई है। विश्व के मैन्यूफैक्चरिंग बाजार में स्मार्ट फोन का हिस्सा एक प्रतिशत से बहुत कम होने का अनुमान है।
मैन्यूफैक्चरिंग के मूल में मेक इन इंडिया में प्रगति होती नहीं दिख रही है। फिर भी संभव है कि स्मार्ट फोन के भारत में बनने के बाद दूसरे उत्पाद भी यहां बनने लगें। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन से हमें आधुनिक तकनीकें मिलने लगेंगी। ये तकनीकें भविष्य में हमारे आर्थिक विकास की आधारशिला बन सकती हैं।

इस स्ट्रेटेजी में खतरा दूसरे स्थान पर है। सामान्यतः माना जाता है कि विदेशी कम्पनियों द्वारा आधुनिक तकनीकें लाई जाती हैंए जैसे सुजुकी नई पीढ़ी की कारों को भारत में लायी। लेकिन जरूरी नहीं कि इन तकनीकों को हासिल करने के लिए सुजुकी जैसी विदेशी कंपनी का आगमन जरूरी हो। तमाम क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों ने अपने बलबूते पर वैश्विक बाजार में अपनी पैठ बनाई है। जैसे दवाओंए कपड़ों और चमड़े के सामान के क्षेत्रों में। संभव है कि सुजुकी के प्रवेश के बगैर भी महिन्द्रा और टाटा के द्वारा आधुनिक कारें बना ली जातीं।
दूसरी समस्या है कि अनेक अध्ययन बताते हैं कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा आधुनिक तकनीकों को ट्रांसफर कम ही किया जाता है। यूनिवर्सिटी आफ आक्सफोर्ड द्वारा किये गये अध्ययन में पाया गया कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा तकनीकों का ट्रांसफर आटोमेटिक नहीं होता है। विशेष दबाव बनाने पर ही ये तकनीकों का ट्रांसफर करती हैं। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी अंकटाड ने पाया कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा तकनीकों का ट्रांसफर मुख्यतः विकसित देशों के बीच ही होता है।
जैसे अमेरिकी कम्पनियों द्वारा फ्रांस में निवेश करने पर तकनीक का ट्रांसफर होता है परन्तु उसी कम्पनी द्वारा भारत में निवेश करने पर तकनीक का ट्रांसफर नहीं होता। विश्व बैंक के अधिकारियों द्वारा किये गये अध्ययन में पाया गया कि विदेशी निवेश के लाभ हासिल करने के लिये बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर कुछ प्रतिबंध लगाना जरूरी हैं। निष्कर्ष है कि उचित प्रतिबन्धों के अभाव में तकनीकी ट्रांसफर नहीं होता। यहां समस्या है कि प्रतिबंध लगाएंगे तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां आएंगी ही नहीं। दोनों तरफ संकट है। प्रतिबंध नहीं लगाएंगे तो तकनीकों का ट्रांसफर नहीं होगा और मेक इन इंडिया मुट‍्ठी भर विदेशी कंपनियों तक सिमट कर रह जाएगा।
यहां चीन के अनुभव को समझने की जरूरत है। यह सही है कि चीन ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आह‍्वान किया और विश्व का मैन्यूफैक्चरिंग हब बन गया। परन्तु चीन की इस सफलता में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के योगदान के विषय में संशय बना हुआ है। चीन में मैन्यूफैक्चरिंग के विकास में घरेलू कंपनियों का भारी योगदान रहा है। इसके अतिरिक्त वर्तमान में चीन की विकास दर में आ रही गिरावट लाने में इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्राॅफिट तथा रायल्टी को स्वदेश भेजने की अहम भूमिका दिखती है। अतः चीन के माडल का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।
इस दृष्टि से मोदी द्वारा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का खुला आह‍्वान करने पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। विशेषकर चूंकि इनके आगमन से देश को वित्तीय नुकसान अवश्य ही झेलना पड़ता है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा मेजबान देश में कमाये गये लाभ के बड़े हिस्से को अपने मुख्यालय भेज दिया जाता है। तकनीकों की रायल्टी के मद पर भी रकम भेजी जाती है। मुख्यालय से खरीदे गये रा.मेटीरियल का दाम बढ़ाकर भी रकम को भेज दिया जाता है।
जैसे कोका कोला द्वारा अमेरिका स्थित अपने मुख्यालय से कनसन्ट्रेट का आयात किया जाता है। इसकी पेमेंट कोका कोला इंडिया द्वारा कोकाकोला अमेरिका को की जाती है। 100 रुपये के कनसन्ट्रेट का पेमेंट 1000 रुपये किया जाये तो 900 रुपये को गैर कानूनी तौर से भेज दिया जायेगा। इस रकम पर भारत को इनकम टैक्स नहीं मिलेगा। कोका कोला का उत्पादन यदि भारतीय कम्पनी द्वारा किया जाता तो इस रकम को बाहर नहीं भेजना होता।
मोदी के सामने चुनौती है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की तकनीकों को ट्रांसफर करा लें तथा रकम को बाहर भेजने पर रोक लगायें। तब इनका प्रवेश देश के लिये लाभप्रद होगा। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा निवेश के प्रस्तावों पर भारत सरकार से स्वीकृति ली जाती है। मोदी को चाहिये कि इन प्रस्तावों के साथ ष्तकनीकी आडिटष् करने की शर्त लगायें। वर्तमान में बड़ी कम्पनियों द्वारा ष्इनर्जी आडिटष् कराकर अपनी वार्षिक बैलेंस शीट के साथ प्रस्तुत की जाती है। बताना होता है कि ऊर्जा की खपत कम करने के लिये इन्होंने क्या कदम उठाये हैं।
इसी तर्ज पर विदेशी कम्पनियों के लिये अनिवार्य कर देना चाहिये कि वे बतायें कि कौन.सी आधुनिक तकनीकें वे लेकर आयेंगे और किस प्रकार भारतीय कम्पनियों को उनका ट्रान्सफर किया जायेगा। इन प्रस्तावों को उद्योग मंत्रालय की वेबसाइट पर डाल देना चाहिये और स्वीकृति देने के पहले जन.सुनवाई करनी चाहियेए जिससे इनके प्रभाव की जानकारी रखने वाले उद्यमी तथा अर्थशास्त्री अपनी बात कह सकें। इनकी बात का संज्ञान लेने के बाद सरकार निर्णय ले।
ऐसा करने से भारत का तकनीकी उच्चीकरण करने में मोदी सफल होंगे। जर्मनी के साथ ग्रीन इनर्जीए फ्रांस के साथ हाई स्पीड ट्रेन तथा कनाडा के साथ एटॉमिक रियेक्टर के समझौतों को भी इस प्रक्रिया के अन्तर्गत लाना चाहियेए जिससे सही स्थिति की जानकारी जनता तथा सरकार को मिले। केवल राफेल जैसे रक्षा सौदों को इस प्रक्रिया से मुक्त किया जाना चाहिये।
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अस्मिता का समझौता अस्वीकार्य

अस्मिता का समझौता अस्वीकार्य

उच्चतम न्यायालय ने पिछले सप्ताह एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनायाए जिसमें व्यवस्था दी गयी कि बलात्कार और बलात्कार के प्रयास जैसे जघन्य अपराधों के मुकदमे में आरोपी और पीडि़त के बीच किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं हो सकता।
यह फैसला सुनाये जाने से चंद दिन पहले ही मद्रास उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश का फैसला सुर्खियों में था। इस मामले में न्यायालय ने बलात्कार के मामले में आरोपी को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था ताकि वह पीडि़ता के साथ विवाह की संभावना तलाश सके।
इस मामले में पीडि़ता के माता.पिता नहीं हैं और उसके एक बच्चा है जो बलात्कार की घटना के बाद पैदा हुआ। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश डीण् देवदास ने अपने एक पुराने अनुभव के आधार पर इस मामले में बलात्कारी को जमानत पर रिहा करने का फैसला किया।
राष्ट्रमंडल मानवाधिकार संगठन के अध्ययन के अनुसार भारत में हर घंटे कम से कम दो महिलायें बलात्कार की शिकार होती हैं। इस संगठन ने 13 साल तक महिलाओं के प्रति होने वाले हिंसक अपराधों का विश्लेषण किया और पता चला कि यहां रोजाना 57 महिलायें बलात्कार की शिकार होती हैं। इस संगठन के अनुसार 2001 से 2013 की अवधि में देश के 28 राज्यों और सात केन्द्र शासित प्रदेशों में कुल 2ए64ए130 बलात्कार के मामले रिपोर्ट किये गये थे जबकि अकेले दिल्ली में इस अवधि में 8060 ऐसे मामले सामने आये।
उच्चतम न्यायालय ने नाबालिग से बलात्कार के प्रयास के आरोप को छेड़छाड़ में तबदील कर उसकी सजा कम करने के खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार की अपील पर एक जुलाई को फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति प्रफुल्ल सी पंत की दो सदस्यीय पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा.बलात्कार और बलात्कार के प्रयास जैसे आरोप में समझौते के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता क्योंकि यह महिला के शरीरए जो उसका अपना मंदिर हैए के खिलाफ अपराध है।
यह मामला मध्य प्रदेश के गुना जिले के एक गांव की सात साल की बच्ची का है जो 27 दिसंबरए 2008 को अपनी मां की तलाश में निकली थी। रास्ते में उसे आरोपी मिला जो उसे पार्वती नदी के पास ले गया। आरोपी ने उससे बलात्कार का प्रयास किया था लेकिन बच्ची के शोर मचाने की वजह से वह अपने कुत्सित प्रयास में सफल नहीं हो पाया था।
इस मामले में गुना की सत्र अदालत ने आरोपी और पीडि़त के परिवार के बीच हुए समझौते को अस्वीकार करते हुए दोषी को पांच साल की सश्रम सजा सुनायी थीए लेकिन मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने बलात्कार के प्रयास के आरोप को बदलते हुए इसे छेड़छाड़ के मामले में तबदील करने के साथ दोषी की सजा को जेल में बिताई गयी अवधि तक सीमित कर दिया था। न्यायाधीशों ने उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण से असहमति व्यक्त की और कहा कि ऐसे मामलों में नरम रवैया अपनाने से अदालतों को गुरेज करना चाहिए।
न्यायाधीशों ने बलात्कार और बलात्कार के प्रयास के मामलों में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरतने पर जोर देते हुए कहा कि ये ऐसे अपराध हैं जो पीडि़त को जीवन भर सालते हैं और उसकी प्रतिष्ठा को धूल धूसरित कर देते हैं। न्यायालय की ताजा व्यवस्था आने से पहले से ही अकसर पढ़ने और सुनने को मिलता है कि निचली अदालत ने बलात्कार के आरोपी को बरी कर दिया क्योंकि पीडि़ता अदालत में अपने बयान से मुकर गयी और उसने अपनी गवाही में कहा कि अब उसकी आरोपी से शादी हो गयी है या फिर चूंकि आरोपी शादी से इनकार कर रहा थाए इसलिए उसने घर वालों के दबाव में उसके खिलाफ बलात्कार की शिकायत दर्ज करायी। तो क्या बलात्कार की झूठी शिकायत दर्ज कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
यदि हम वास्तव में इस तरह के अपराधों के प्रति गंभीर हैं। यह चाहते हैं कि नारी सम्मान की रक्षा हो। कोई भी व्यक्ति किसी नारी से जबरदस्ती करने की कल्पना तक नहीं करे तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि त्वरित अदालतों में बलात्कारए बलात्कार के प्रयास और यौन हिंसा से संबंधित मुकदमों की एक निश्चित अवधि के भीतर सुनवाई पूरी हो। आरोपियों को दोषी पाये जाने पर अधिकतम सजा दी जाये।
सरकार को इस तरह के अपराधों की शिकार हुई बच्चियोंए किशोरियोंए युवतियों और महिलाओं के पुनर्वास की ओर भी विशेष ध्यान देना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो बलात्कार और बलात्कार के प्रयास जैसे अपराधों में आरोपी और पीडि़ता के बीच समझौता करने का यह सिलसिला किसी न किसी रूप में चलता ही रहेगा।
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Monday, 6 July 2015

यूरोपीय संघ पर ग्रीस संकट का साया

यूरोपीय संघ पर ग्रीस संकट का साया

एक महान परिकल्पना के साथ यूरोपियन आर्थिक संघ की स्थापना की गई थी जो आगे चलकर यूरोपियन यूनियन ;ईयूद्ध में तबदील हो गयी थी। आज यह संगठन इसलिए मुश्किल में पड़ गया है क्योंकि इसका एक सदस्य यूनान ;ग्रीसद्ध बुरी तरह कर्ज में डूब चुका हैै। आने वाले दिनों या हफ्तों में यह भी तय हो जाएगा कि क्या यह देश उस यूरोऽजोन का सदस्य रह भी पाएगा या नहींए जिसमें यूरोपियन यूनियन के देश एक साझी मुद्रा में विनिमय करते हैं। लेकिन जिस तरह से परिस्थितियां शक्ल अख्तियार करती जा रही हैंए वह यूनान वाले संकट से ज्यादा गंभीर हैं।
ब्रिटेन की स्थिति भी विचित्र बन गयी है क्योंकि प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने चुनाव जीतने से पहले वोटरों से वादा किया था कि वर्ष 2017 खत्म होने से पहले जनमत संग्रह करवाया जाएगा कि क्या देश को यूरोपियन यूनियन का सदस्य आगे भी रहना चाहिए या नहीं। लेकिन इस महाद्वीप में वाम या दक्षिणपंथी विचारधारा की ओर झुकाव रखने वाली ऐसी छोटी.मोटी पार्टियों का उद‍्भव होना यह दर्शाता है कि कईयों का इसके और मजबूत गठजोड़ वाले ध्येय से मोह भंग हो गया है और खासकर ब्रिटेन को यही तीन शब्द ज्यादा चुभते हैं।
पहले पहल खुशी से अपने सरमाए के एक बड़े भाग को मदद के रूप में देने वाले यूरोपीय देश अब यह देख रहे हैं कि उन्होंने कुछ ज्यादा ही छोड़ दिया। यूनान में अतिवादियों से भरी और वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाली सीरिऽजा पार्टी का उद‍्भव इसलिए भी हो पाया क्योंकि देश का कर संग्रह ढांचा बहुत कमजोर हो गया था। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम घाटे में चल रहे थे और अपनी आय से ज्यादा खर्च करने की आदत लोगों में घर कर गई थी। इसके अलावा मैरीन ली पेन की अगुवाई वाली अति दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल फ्रंट ऑफ फ्रांस का कहना है कि यूरो की बजाय विनिमय फिर से पुरानी मुद्रा में होना चाहिए और इसे लागू करने के लिए यूरोपिनय यूनियन के पास ज्यादा समय नहीं है।
लंबे समय तक अमीरी भोगने के बाद यूरोपियन यूनियन के अधिकांश देश इन दिनों मंदी की चपेट में हैं। अब चूंकि मौजूदा यूरोपियन पीढ़ी चाहती है कि उसे यूरोपियन यूनियन के जिस मर्जी सदस्य देश में जाकर रोजी.रोटी कमाने और रहने का हक होना चाहिएए ऐसा न होने पर मंदी की मार उन्हें और ज्यादा कचोटती है। जैसे कि यूनान का उदाहरण हैए मुख्यधारा से इतर पार्टियों का उद‍्भव अचानक हो गया है और हंगरी जैसे सदस्य देश में नेतृत्व अपनी किस्म का अलग अधिनायकवादी तंत्र विकसित करने में लगा है ताकि वहां के सर्ब समुदाय को यूरोपीय देशों से मिलने वाली इमदाद में रुकावटें खड़ी की जा सकें।
यूरोपियन देशों की संकुचित मानसिकता को इससे ज्यादा नहीं दर्शया जा सकता कि किस तरह वे अफ्रीका और मध्य.पूर्व में मची मारकाट और अफरातफरी से बचकर निकल आए लोगों के जत्थों को अपने मुल्कों में पनाह देने से बच रहे हैं। अपनी भौगोलिक स्थिति के चलते इटली और यूनान को सबसे ज्यादा यह बोझ उठाना पड़ रहा है। जबकि यूरोपियन यूनियन ने अपनी मानवता हितैषी छवि की इज्जत बचाए रखने की खातिर यह फॉर्मूला तय किया था कि 40000 विस्थापितों को सभी सदस्य देशों में बांट कर पनाह दी जाएगीए लेकिन कई अन्यों के अलावा ब्रिटेन ने इन्हें लेने से साफ इनकार कर दिया।
यूनान संकट ने यूरोपीय देशों को यह सोचने का मौका दिया है कि किस प्रकार की समस्याएं आगे आने वाली हैं। इस बारे में सबसे बड़ी चेतावनी यूरोपियन यूनियन में सबसे ज्यादा रसूख रखने वाले जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की ओर से आई है। यूनान के केस में यूरोपियन यूनियन पर भी बराबर का इल्जाम आएगा क्योंकि इसने उसे संकट से उबारने के लिए तब दूसरा विकल्प थाली में परोस डाला जबकि यूनान ने पहले वाले पर भी पूरी तरह अमल नहीं किया थाए तिस पर तुर्रा यह कि नाकाम रही आखिरी समझौता वार्ता के दौरान भी यूनानी नेता एलेक्सी सिपरास ने तीसरे संकटमोचन की मांग कर डाली। हालांकि यूनान के लोग सालों से चली आ रही मितव्ययता से तंग आ चुके थे लेकिन उनमें से एक भी ऐसा नेता पैदा नहीं हो सका जो इस संकट को नाथने का माद्दा रखता हो।
आर्थिक संकट से निकलने के लिए यूनान कौन सा रास्ता अख्तियार करेगाए इसका पता जनमत संग्रह के बाद ही चल पायेगा। ईयू के नेतृत्व को चाहिए कि वह उन्हें दरपेश मौजूदा संकट की तह में छिपी राजनीतिक समस्याओं पर अपना ध्यान दे। ब्रिटेन की समस्या को अलग तरीके से निबटाया जाना चाहिए क्योंकि वह सदा ही खुद को अन्य यूरोपियनों से अलग और विशिष्ट मानता आया है और उसे इससे बाहर रहकर जुड़े रहने की खास छूट भी मिली हुई है। ईयू की सदस्यता छोड़ने पर यूरोपियन भावना के अलावा स्वयं ब्रिटेन के हितों को भारी नुकसान होगा।

समस्या यह है कि कैसे यूरोप की नयी पीढ़ी में यह भावना जगाई जाए कि यूरोप की महानता और हित साथ रहने में हैं। आज हम ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां पर संपर्क साधनों की वजह से आपसी संबंध काफी बड़े पैमाने पर बने रहते हैंए लिहाजा 17वीं और 18वीं सदी सरीखे राष्ट्रवाद में फिर से लौटना संभव नहीं है।
परंतु सुश्री मर्केल भी असंभव को संभव नहीं कर सकतीं क्योंकि उन्हें भी अपने लोगों की राय को ध्यान में रखना है। जर्मनी के लोगों को खासतौर पर इस बात की आशंका है कि ऐसा न हो कि यूनान की मदद करने के फेर में कर्ज में दिया जाने वाला धन कहीं उनके देश के सारे पैसे को न लील ले। शायद यही समय है कि चांसलर मर्केल को चाहिए वह अगुवाई करके समस्या का हल निकालें। ध्यान देने योग्य है कि यूरोपियन यूनियन अपनी उस आरंभिक अवस्था से काफी आगे निकल आयी है जब यह कोयला और इस्पात समृद्ध देशों का गुट हुआ करता था।
फिर भी यूरोपियन यूनियन एक ऐसा कार्यक्रम है जिसे चलते रहना चाहिए और इसके सदस्य देशों को दरपेश समस्याओं का हल किसी न किसी तरह से निकाला जाना चाहिए।
SOURCE : dainiktribune.com

प्रसन्नता से हर पल नया जन्म

प्रसन्नता से हर पल नया जन्म

एक आदर्श एवं संतुलित इनसान की सर्वोपरि प्राथमिकता है उसका हंसता हुआ चेहरा एवं मुस्कराती हुई जीवनशैली। हंसते रहना एक दैवी गुण हैए जिस पर अमीरों की सुविधाएं न्योछावर की जा सकती हैं। हंसने की आदत चित्त को हल्का बनाती है और शरीर को निरोगए दीर्घजीवी एवं सुंदर बनने की सुविधा उत्पन्न करती है।
प्रसन्नता के संग हम हर पल एक नया जन्म ले सकते हैं। हर पल एक नई शुरुआत हो सकती है। इसी सन्दर्भ में दलाई लामा का मार्मिक कथन है कि प्रसन्नता अपने आप नहीं मिलती। यह आपके अपने कर्मों से ही आती है। एक प्रसन्न मनुष्य सुखी होता है और वह संस्कृति व सभ्यता को अपने कर्मों से जीवंत रखता है और एक नये इतिहास का सृजन करता है।
खूबसूरत बनने के लिए किसी ब्यूटी पार्लर में जाकर चेहरे को सुंदर बनाने की आवश्यकता नहीं। चेहरे को सुंदर बनाने का सर्वोत्तम उपाय है.मुस्कुराना। मिनटों की मुस्कान घंटों की थकान को दूर करती है। महापुरुषों के चेहरे पर हमें सदैव अभिनव कांतिए सौम्यता व प्रसन्नता के दर्शन होते हैं।
चेहरा दिल का दर्पण है। आपका चेहरा यदि गुलाब के फूल.सा हंसता.खिलता हैए इसका मतलब आपके हृदय में भी प्रसन्नता का निर्झर बह रहा है। आंतरिक प्रसन्नता अवश्य बाह्य जगत में प्रकट होगी। हंसते खिलते चेहरे में चुम्बक.सा आकर्षण होता है। मुस्कुराती आंखें बरबस सभी का ध्यान आकर्षित कर लेती हैं। मुस्कान बेगानों को अपना बनाती है। एक कहावत है ष्सौ दवा एक हवाए सौ हवा एक मुस्कानष्।
हम उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करें और सद्प्रवृत्तियों का चिंतन करें। ऐसा करते हुए हमें जो बहुमूल्य रत्न उपलब्ध होगाए वह प्रसन्नता ही है। हम सर्वथा निर्धन और अक्षम होते हुए भी इस बहुमूल्य रत्न को उपहार में देने में सक्षम होंगे और यह ऐसा उपहार होगा जो हमें भी समृद्ध बनाएगा और पाने वाले के जीवन को भी सुखी और समृद्ध करेगा। इसके माध्यम से हम कुछ भी करने में सक्षम हो सकते हैं। चाहे वह हमारी सोच होए चाहे हमारा जीवन हो या हमारे सपने होंए सब सच हो सकता है।
बेन्जामिन की उक्ति भी मार्मिक है कि हंसमुख चेहरा रोगी के लिये उतना ही लाभकारी है जितना कि स्वस्थ ऋतु। जिस व्यक्ति के भीतर दिल से निकली सच्ची प्रसन्नता विराजमान रहती हैए उसका लोक व्यवहार उत्कृष्ट होता है। प्रसन्नता के साथ किया गया भोजन अमृत के रूप में परिवर्तित होता है। प्रसन्नता के साथ ली गई दवा विशेष लाभ देती दिखती है। जो सुख.शांति लाखों रुपए खर्च करके प्राप्त नहीं की जा सकतीए वह प्रसन्नता से सहज सुलभ हो जाती है।
एक संत के विषय में यह प्रसिद्ध था कि जो उनके पास जाता हैए प्रसन्न होकर लौटता है। एक धनी व्यक्ति एकाएक सुखी और प्रसन्न होने की चाह लेकर उनके पास गया और जल्दी से उतावलेपन से प्रसन्न रहने की विधि पूछने लगा। संत उसकी बात अनसुनी करते हुए एक पेड़ के नीचे बैठी चिड़ियों को दाना चुगाते रहे। संत की इसी स्थिति को देखकर धनी व्यक्ति अपना धैर्य कायम नहीं रख पा रहा था और अधिक उतावलेपन से संत से सुखी और प्रसन्न बनने का सूत्र बताने का आग्रह करने लगा। संत अपने काम में आनंदित हो रहे थे। उसने पुनः संत से प्रसन्न रहने का रहस्य पूछा। अधिक आग्रह पर संत ने अलमस्ती से कहा.दुनिया में प्रसन्न होने का एक ही तरीका है.दूसरे को देना। देने में जो आनंद हैए जो सुख हैए वह और किसी चीज में नहीं है। तुम चाहो तो अपनी अमीरी जरूरतमंदों को लुटाकर स्वयं आनंदित रहने वालों में अग्रणी हो सकते हो।
सही तरीके से जीने वाला व्यक्ति अपनी जिंदगी की राहों को जगमगा लेता है और जो जीवन जीने का ढंग नहीं जानतेए उनका जीवन भार बन जाता है। प्रश्न है परिवार एवं समाज में कैसे जीएंघ् इस प्रश्न का पहला उत्तर यह हो सकता है कि प्रसन्नता के साथ जीएंए क्योंकि प्रसन्नता से स्वास्थ्य भी ठीक रहता है और परस्परता भी बढ़ती है। प्रसन्नता ही वैवाहिक जीवन की सफलता का आधार है और इसी से आध्यात्मिक उन्नति भी संभव है। आंतरिक प्रसन्नता के लिए किन्हीं बाहरी साधनों की आवश्यकता नहीं होती। प्रसन्न मन ही अपनी आत्मा को देख सकता हैए पहचान सकता है एवं उस परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है।  हर व्यक्ति के जीवन में अच्छाई और बुराई दोनों होती हैं। अच्छाई को देखकर उसकी प्रशंसा करनाए प्रोत्साहित करना प्रमोद भाव है। आत्म प्रशंसा सुनकर व्यक्ति को जो तृप्ति मिलती है वह घी.दूध से भी नहीं मिलती।
कुछ लोग अपने जीवन से व्यर्थ ही असन्तुष्ट और दुःखी प्रतीत होते हैंए पर जब अंतरंग स्थिति से परिचित होते हैं तो स्वयं के अज्ञान पर हंसने लगते हैं। किसी महापुरुष का कथन है कि आपकी मुस्कुराहट आपके चेहरे पर भगवान के हस्ताक्षर हैं। उसको क्रोध करके अथवा आंसुओं से धोने की कोशिश मत करिए। यह एक ऐसा मंत्र है जो जीवन को सफल एवं सार्थक बनाता है।
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Sunday, 5 July 2015

सांसदों का वेतन

सांसदों का वेतन

सांसदों का वेतन जैसे.जैसे हमारे अधिकांश सांसदों के संसदीय बर्ताव और काम करने के तौर.तरीकों में गिरावट आ रही हैए वैसे.वैसे सुविधाओं की उनकी मांगें बढ़ती जा रही हैं। बीजेपी सांसद योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली संसद की संयुक्त समिति ने कहा है कि सांसदों के वेतन को दोगुना कर दिया जाए। इस समय सांसदों को मासिक वेतन 50ए000 रुपये मिलता है। बात यहीं तक सीमित नहीं है। सांसदों का दैनिक भत्ता 2000 रुपए से अधिक करने और पूर्व सांसदों का पेंशन भी 75 फीसदी बढ़ाने का प्रस्ताव है। 

उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व सांसदों के वेतन में बढ़ोतरी सन 2010 में की गई थी। बहरहालए समिति ने कहा है कि सांसदों के लिए ऑटोमैटिक पे रिविजन की व्यवस्था हो ताकि समय.समय पर बढोतरी स्वयं होती रहे। 34 हवाई यात्राओं में 25 फीसदी किराए के प्रावधान से भी सांसद संतुष्ट नहीं हैं। समिति ने 20 से 25 फ्री हवाई यात्राओं सहित करीब 60 सिफारिशें की हैं। इनमें निजी सचिव के लिए प्रथम श्रेणी के एसी रेल.पास की मांग भी शामिल है। सांसद ग्राम योजना के तहत कुछ भले न हुआ होए आम लोगों के अच्छे दिन आएं न आएंए लगता है सांसदों के तो आ ही जाएंगे। प्रस्ताव कहता है कि सांसदों की स्वास्थ्य सुविधाओं में उनके बच्चों के अलावा पोते.पोतियों को भी शामिल कर लिया जाए।

गौरतलब है कि अपने क्षेत्र में काम कराने के लिए प्रत्येक सांसद 45ए000 रुपए का भत्ता हर महीने पाने का हकदार है। ऑफिस के खर्च के लिए भी माहवार इतनी ही रकम मिलती है। कपड़े और परदे धुलवाने के लिए हर तीसरे महीने 50ए000 रुपए मिलते हैं। सड़क मार्ग का इस्तेमाल करने वाले सांसदों को 16 रुपए प्रति किलोमीटर के हिसाब से यात्रा भत्ता मिलता है। लेकिन यह सब इन्हें कम लगता है। ऐसा लगना स्वाभाविक इसलिए है कि हमारे ज्यादातर सांसदों की नजरें उन लोगों पर रही ही नहीं जिनका प्रतिनिधित्व वे करते हैं। अगर अपने आम वोटरों की जिंदगी परए उनके जीवन की तकलीफों.चुनौतियों पर नजर डालने का वक्त इन्हें मिले तो शायद इनकी भी प्राथमिकता कुछ बदले। मगरए राजनीति का जो चरित्र बनता जा रहा हैए उसमें इसकी संभावना तलाशना आकाश कुसुम तोड़ने जैसा ही हो गया है। ऐसे में यह उम्मीद भर जताई जा सकती है कि वेतन के साथ वे अपनी गरिमा बढ़ाने पर भी ध्यान दें तो बेहतर होगा।
SOURCE :http://navbharattimes.indiatimes.com/opinion/editorial/

समझौते की कोई गुंजाइश नहीं

समझौते की कोई गुंजाइश नहीं

आखिर सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में वह संदेश दे दिया जिसकी सख्त जरूरत थी। बुधवार को अपने एक अहम फैसले में कोर्ट ने साफ.साफ कहा कि रेप के मामलों में किसी भी सूरत में समझौते या मध्यस्थता की कोई बात सोची भी नहीं जा सकती। शीर्ष अदालत ने ठीक ही रेखांकित किया कि रेप जैसे मामलों में आरोपी द्वारा पीड़िता से शादी करने का प्रस्ताव रखना एक तरह से दबाव डालने की कोशिश है और अदालतों को ऐसे प्रयासों से बिल्कुल दूर रहना चाहिए।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कुछ ही दिन पहले मद्रास हाईकोर्ट ने नाबालिग से रेप के एक मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया और आरोपी को जमानत दे दी। दिलचस्प बात है कि हाईकोर्ट ने पीड़िता की तकलीफों के मद्देनजर यह फैसला दिया था जिसके माता.पिता गुजर चुके हैं और जो रेप के बाद पैदा हुए एक बच्चे की अविवाहिता मां हैए मगर बावजूद इसकेए पीड़िता ने मध्यस्थता के प्रयासों में शामिल होने से इनकार कर दिया। मध्यप्रदेश के जिस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनायाए उसमें भी आरोपी ने सात वर्षीया पीड़िता के माता.पिता के साथ समझौते की पेशकश की थी जिसे ठुकराते हुए निचली अदालत ने उसे पांच साल जेल की सजा सुनाई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इसे छेड़छाड़ का केस मानते हुए सजा की अवधि इतनी कम कर दी जितनी कि वह पहले ही जेल में गुजार चुका था।

अदालतों का ऐसा रुख इन्हीं दोनों मामलों तक सीमित नहीं है। दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद समाज में जो जागरूकता महिला अधिकारों को लेकर आई हैए उसका बहुत ज्यादा प्रभाव अदालती प्रक्रियाओं और कोर्ट के फैसलों पर नहीं दिखता। समय.समय पर ऐसे फैसले और ऐसे कॉमेंट आते रहते हैं जो न्यायपालिका की गरिमा के अनुरूप नहीं कहे जा सकते। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह बात खास तौर पर ध्यान देने लायक है कि रेप के मामलों में मध्यस्थता की सिफारिश करने वाला रुख महिलाओं के सम्मान के प्रति संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है।

इसी संदर्भ में पिछले कुछ समय से रेप की शिकायतों में हुई अप्रत्याशित बढ़ोतरी के मसले को भी रखा जा सकता है। इस बढ़ोतरी के पीछे हालांकि महिलाओं की बढ़ी हुई हिम्मत और पुलिस की कम हुई आनाकानी की भी भूमिका रही हैए लेकिन इसके बावजूद यह मुद्दा कई मंचों से उठाया जाता है कि रेप या रेप के प्रयासों की झूठी शिकायतें पहले के मुकाबले ज्यादा आने लगी हैं। सुप्रीम कोर्ट का ताजा आदेश इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण कहा जाएगा है। वजह यह है कि अगर कोई झूठी शिकायत आती है तो अमूमन उसके पीछे मकसद किसी तरह का फायदा उठाना ही होता है। ऐसे में समझौते की संभावना खत्म करके सर्वोच्च अदालत ने झूठी शिकायतों के लिए भी गुंजाइश कम कर दी है।
SOURCE : http://navbharattimes.indiatimes.com/other/opinion/editorial/articlelist/2007740431.cms

Friday, 3 July 2015

सरकारी सपना और जमीनी सच

सरकारी सपना और जमीनी सच

मोदी सरकार के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में से एक है स्मार्ट सिटी। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने की योजना की घोषणा कर दी है। प्रधानमंत्री स्मार्ट सिटी योजना के जरिये भारत के हर आदमी को आवास और सभी सुविधाएं देना चाहते हैं। उन्होंने हिंदुस्तान में सभी लोगों को घर देने के लिए साल 2022 का लक्ष्य रखा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शहरी भारत की तस्वीर बदलने के मकसद से तीन बड़ी योजनाएं शुरू की हैं। उन्होंने आधुनिक सुविधाओं से युक्त स्मार्ट सिटी मिशनए पुनरुद्धार एवं शहरी परिवर्तन के लिए अटल मिशन ;अमृतद्ध और सभी के लिए आवास मिशन का आगाज किया। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत 100 शहरों को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित किया जाएगा। सबके लिए आवास योजना में शहरी क्षेत्रों में निम्न और निम्न मध्यम वर्ग के लिए दो करोड़ आवास इकाइयां बनाई जाएंगी। अमृत मिशन में एक लाख से अधिक आबादी वाले 500 शहरों को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। सरकार ने बजट में इसके लिए 7060 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया है।
बहरहालए स्मार्ट सिटी के जो तमगे सिंगापुर या क्योतो या वेनिस को दिये गये हैंए वे हिंदुस्तान में लागू हो सकते हैं। दरअसलए किसी भी शहर की रूपरेखा में आठ महत्वपूर्ण विशेषताएं होती हैं। पहला है सरकारी प्रशासनए दूसरा ऊर्जा.पानीए बिल्डिंगए पर्यटनए यातायातए स्वास्थ्यए शिक्षा और सुरक्षा। ये ऐसे बिंदु हैं जो एक शहर में होने चाहिए। स्मार्ट का मतलब किसी शहर की आर्थिक तरक्की या तकनीकी तरक्की कतई नहीं है। निवासियों के रहन.सहन का स्तरए उन्हें मिलने वाली सुविधाएंए टेक्नोलॉजी का बेहतर इस्तेमाल जैसी कई चीजें मिलकर एक शहर को स्मार्ट बनाती हैं।
यह सही है कि हमारी कुल आबादी का महज 30.35 फीसदी हिस्सा शहरों में निवास करता हैए लेकिन भारत की कुल जीडीपी का तकरीबन 65 फीसदी हिस्सा इन्हीं से आता है। माना जा रहा है कि अगले 15 वर्षों में शहरों से हमारी कुल जीडीपी की तकरीबन 75 फीसदी आय अर्जित होगी। इससे पता चलता है कि भविष्य के हमारे आर्थिक विकास के लिए शहरों का कितना अधिक महत्व है।
यहां पर विचार करना आवश्यक है कि आखिर स्मार्ट सिटी का वास्तविक आशय क्या हैघ् जहां कुछ लोग सूचना और संचार तकनीक की मजबूत भूमिका की वकालत कर रहे हैं तो अन्य लोग इसके टिकाऊ होने के पहलू की चर्चा कर रहे हैं। इसी तरह कुछ लोग सेवाओं को उपलब्ध कराने के लिए निजी क्षेत्र के सहयोग से कुशलता बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं तो कुछ अन्य समावेशी विकास की बात कह रहे हैं ताकि सभी को इसका फायदा मिल सके। इसी तरह कुछ लोग हर समय सेवाओं की उपलब्धता पर जोर दे रहे हैं तो कुछ लोग सेवाओं की गुणवत्ता पर ध्यान देने को कह रहे हैं।
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत जिन शहरी इलाकों को शामिल किया जाएगा वहां 24 घंटे बिजली और पानी की व्यवस्था होगी। शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं होंगीए साइबर.कनेक्टिविटी और ई.गवर्नेन्स की सुविधा होगीए हाईटेक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क बहाल किया जाएगा और नालियों और कचरा निपटान का सौ फ़ीसदी इंतज़ाम होगा।
लेकिन इसके प्रभावों से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि शहरों को मूल रूप से किस उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है। शहरों को बेहतर बनाने के चक्कर में ऐसा न हो कि हम धरोहर ही खो बैठें। दूसरी तरफ निर्माण के दौरान पेड़ न कटें। 24 घंटे बिजली के लिए परमाणु ऊर्जा का सहारा लेना होगाए जिसके अपने ख़तरे हैं।
खैरए 2008 में जहां 34 करोड़ भारतीय शहरों में थेए वहीं 2030 तक इनकी तादाद बढ़कर 59 करोड़ होने का अनुमान है। ऐसे में बड़ी आबादी को शहरों में बसाने और उन्हें आजीविका मुहैया कराने के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा शहरों की जरूरत होगी। साल 2030 तक 77 शहरों की आबादी दस लाख से अधिक होगी और 30 शहर 40 लाख की आबादी के साथ मेगा सिटी बन चुके होंगे। भारतीय शहरों को ष्स्मार्ट सिटीष् बना पाना आसान काम तो बिल्कुल नहीं होगा। सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि हमारे ज्यादातर पुराने शहर अनियोजित हैंए उनकी सही मैपिंग उपलब्ध नहीं है। इन शहरों की 70 से 80 फ़ीसदी आबादी अनियोजित इलाकों में रहती है। इन इलाकों में लगातार आवाजाही होती रही है। ऐसे में आप काम की शुरुआत भी कैसे कर पाएंगे।
शहरी विकास मंत्रालय ने ये तय कर दिया है कि सबसे ज्यादा 13 स्मार्ट सिटीज उत्तर प्रदेश में होंगे। तमिलनाडु के 12 और महाराष्ट्र के 10 शहरों को स्मार्ट सिटीज के तौर पर विकसित किया जाएगा। मध्य प्रदेश के 7 और गुजरात और कर्नाटक के 6.6 शहर स्मार्ट सिटीज बनेंगे। दुनिया भर में स्मार्ट सिटी को एक बिजनेस आइडिया के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन एक बड़ी तस्वीर ये है कि दुनिया के कई देशों में पहले से ही स्मार्ट सिटी हैं तो भारत में ये बनें तो इसे एक अच्छी पहल ही कहा जाएगा।
SOURCE :http://dainiktribuneonline.com/2015/07