Friday, 22 May 2015

बचपन पर भारी बस्ता

बचपन पर भारी बस्ता

महाराष्ट्र सरकार स्कूली बच्चों के बस्ते के बोझ को लेकर गंभीरता से विचार कर रही है। इस विचार पर अमल करने की सराहनीय पहल ठाणे नगर निगम निकाय से हुई है। जिसके अंतर्गत ठाणे नगर निगम के अधीन चलने वाले डेढ़ सौ प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पहली और दूसरी कक्षाओं के बच्चों को बस्ता पीठ पर लादने से छुटकारा मिल सकेगा। बच्चों को बस्ता घर से ढोकर नहीं ले जाना होगा बल्कि स्कूल में ही किताबें रखने का प्रावधान रहेगा। स्कूल के सभी डेस्क में एक लॉकर की व्यवस्था की जाएगी जिसमें हर विद्यार्थी छुट्टी के बाद अपना बस्ता रखकर घर जा सकेगा। इतना ही नहींए बस्ते का बोझ कम करने के अलावा स्कूलों में शिक्षण का आधार आपसी संवाद को बनाने की भी कवायद की जाएगी। साथ ही कुछ विषयों को साथ मिलाकर किताबों की संख्या घटाने की भी कोशिश की गयी है।
आजकल सरकारी हों या निजी स्कूलए सभी में बच्चों को भारी.भरकम बस्ता थमा दिया जाता है जो उनकी सेहत और शिक्षा दोनों पर पहले पायदान पर ही भारी पड़ रहा है। शिक्षाविद् भी मानते हैं कि 4 से 12 साल की उम्र बच्चों के व्यक्तित्व के विकास की उम्र होती हैं। ऐसे में इस पुस्तकीय भार से मासूम बच्चों के स्वाभाविक विकास और समझ की प्रक्रिया बाधित होती है। वहीं बाल मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि 10.11 साल की आयु तक के बच्चों के विकास में किताबी ज्ञान नहींए भावनात्मक योगदान की भूमिका अधिक है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में कुछ समय पहले मानवाधिकार आयोग भी इस मामले में दखल दे चुका है। आयोग के मुताबिक निचली कक्षाओं का बस्ता पौने दो किलो और ऊंची कक्षाओं का बस्ता साढ़े तीन किलो से ज्यादा भारी नहीं होना चाहिए। मानवाधिकार आयोग ने यह फैसला बच्चों के पीठ दर्द और कंधे की जकड़न की समस्या से निजात दिलाने के लिए ही दिया था।
शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का सर्वांगीण विकास होता है पर आज के दौर में शिक्षा बचपन पर भारी पड़ रही है। उनका स्वास्थ्य और समझ दोनों ही इससे प्रभावित हो रहे हैं। यह सब बच्चों को बेहतर शिक्षा दिए जाने के नाम पर हो रहा है। इसमें स्कूलों के प्रबंधन से लेकर सरकारी नीतियों तक सभी ने अपनी भूमिका निभाई है। शिक्षा प्रणाली को लेकर हमारे यहां अनगिनत प्रयोग तो हुए हैं पर हमारे यहां अभी तक स्कूल बैग के वजन को लेकर कोई मानक तय नहीं किए गए हैं।
सोशल डेवलेपमेंट फाउंडेशन के तहत हाल ही में करवाए गये एसोचैम के सर्वेक्षण के अनुसार हमारे यहां पांच से बारह वर्ष के आयु वर्ग के 82 फीसदी बच्चे अत्यधिक भारी स्कूल बैग ढोते हैं। इस सर्वेक्षण में यह भी सामने आया है कि दस साल से कम उम्र के तकरीबन 58 प्रतिशत बच्चे हल्के कमर दर्द के शिकार हैं जो आगे चलकर बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को न्योता देने वाला लक्षण है।
रीढ़ चिकित्सा के विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि लगातार बच्चों का यूं बस्ते का बोझ ढोना उन्हें स्थायी या अस्थायी रूप से कूबड़पन का भी शिकार बना सकता है। भारी बस्ते बच्चों की हड्डियों में विकृति पैदा करते हैं। मौजूदा दौर में बच्चों का इतना बड़ा प्रतिशत पीठ पर अपने पूरे वज़न का 35 प्रतिशत बोझ उठाकर चल रहा है। दिल्लीए लखनऊए जयपुरए चेन्नईए बेंगलुरु और मुंबई जैसे बड़े शहरों में किए गए सर्वे के इन परिणामों को देखकर गांव.कस्बों की परिस्थितियों का अनुमान तो सरलता से लगाया जा सकता हैए जहां बच्चे बस्ता पीठ पर लादे कोसों पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों द्वारा बस्तों का बोझ उठाया जाना उनकी दिनचर्या का ही हिस्सा बन जाता है। अत्यधिक बोझ उठाये जाने के चलते बच्चे की रीढ़ पर दबाव पड़ता है और विकसित होते शरीर की मस्कुलो.स्केलेटल प्रणाली पर दुष्प्रभाव पड़ता है। ये समस्या लड़कों से ज्यादा लड़कियों में देखने में आती है। पुस्तकीय भार को उठाये अव्वल आने की इस दौड़ में उनका बचपन संवेदनशीलता खोता जा रहा है। जिन दो हज़ार स्कूली बच्चों पर यह सर्वेक्षण किया गया हैए उनमें से 1500 बच्चे किसी सहारे के बिना ठीक से बैठ पाने में भी असमर्थ हैं।
हालांकि केंद्र सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 2010.2011 में समिति गठन कर बस्तों का वज़न निर्धारित कर दिया था। जिसमें सभी प्रदेशों के शिक्षा मंत्रियों को बुलाकर उनकी सहमति से बस्ते का वज़न बच्चे की कक्षा के अनुसार रखा गया था। इतना ही नहींए बस्ते का बोझ कम करने को लेकर यशपाल कमेटी के तहत तो देशव्यापी बहस छिड़ गयी थी। 1990 में यशपाल समिति ने स्कूली बच्चे के पाठ्यक्रम में बोझ की कमी सिफारिश की थी। लेकिन दो दशक बीत जाने के बाद भी कोई प्रभावी निर्णय नहीं लिया गया है। हकीकत यह है कि आज भी स्कूली बच्चे मानव संसाधन विकास मंत्रालय की गाइडलाइन्स से दोगुने वज़न का बस्ता ढो रहे हैं। न तो शिक्षा विभाग को इसकी चिंता है और न स्कूली प्रशासन इस ओर ध्यान दे रहा है।
फिलहाल महाराष्ट्र में लागू किया गया यह निर्णय वाकई स्वागत योग्य है। देश के अन्य हिस्सों में भी बच्चों के मन और जीवन पर लदे किताबी भार को घटाने की कवायद होनी ही चाहिए। इस बोझ को कम कर शुरुआत से ही वजनी पाठ्यक्रम के बजाय व्यावहारिक शिक्षा पर अधिक ध्यान केंद्रित किये जाने की आवश्यकता है।
SOURCE :DAINIKTRIBUNEONLINE.COM

Thursday, 21 May 2015

दोमुंही सियासत

दोमुंही सियासत

दिल्ली की केजरीवाल सरकार और केंद्र के बीच टकराव रुकने का नाम नहीं ले रहा। ताजा विवाद कार्यवाहक मुख्य सचिव की नियुक्ति को लेकर है। राज्य सरकार के न चाहते हुए भी लेफ्टिनेंट गवर्नर ;एलजीद्ध नजीब जंग ने इस पद पर शकुंतला गैमलिन को नियुक्त कर दिया। जब राज्य सरकार ने इस फैसले पर आपत्ति जताई और गैमलिन के कामकाज को लेकर टिप्पणी की तो केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने इसे नॉर्थ ईस्ट के लोगों का अपमान बता दिया। साफ लग रहा है कि केंद्र सरकार अपने फैसले को स्टेट गवर्नमेंट पर थोपने की कोशिश कर रही है और चाहती है कि मुख्यमंत्री और उनके सहयोगी चुपचाप इसे स्वीकार कर लें। देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने केंद्र के इस रवैये पर सवाल उठाए हैं।

दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने साफ कहा कि मुख्य सचिव की नियुक्ति मुख्यमंत्री की मर्जी से ही होनी चाहिए। सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने भी केंद्र द्वारा राज्य सरकार के अधिकारों के अतिक्रमण का विरोध किया। और तो औरए खुद बीजेपी भी हमेशा स्वयं को एक संघवादी पार्टी बताती है और राज्य सरकारों के अधिकार सुरक्षित रखने की वकालत करती रही है। लेकिन बात क्या हैए जो केंद्र की सत्ता संभालते ही वह संघीय शिष्टाचार की सारी सीमाएं पार करते हुए एक राज्य सरकार को अपमानित करने में जुट गई हैघ् इसे पार्टी का दोमुंहा रवैया नहीं तो और क्या कहेंगेघ् यही नहींए वह तो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की भी पुरजोर वकालत करती रही है। लेकिन उसका अभी का व्यवहार बताता है कि वह दिल्ली में सिर्फ और सिर्फ एक कठपुतली सरकार ही चाहती है।

जब भी अधिकारों की बात आती हैए लेफ्टिनेंट गवर्नर जीएनसीटीडी एक्टए 1991 का हवाला देने लगते हैं कि उन्हें अमुक.अमुक अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन कानून के शब्दों के बजाय उसमें निहित भावों को देखने की कोई जरूरत वे नहीं महसूस करते। सत्ता का विकेंद्रीकरण और जनता की व्यापक भागीदारी हमारे संविधान की बुनियाद है। दिल्ली को राज्य का दर्जा देने का फैसला इसकी बढ़ती आबादी और इससे पैदा होने वाली सामाजिक.आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखकर किया गया थाए ताकि यहां की प्रशासनिक प्रक्रिया में जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। सिर्फ इसकी संवेदनशील स्थिति के कारण कानून.व्यवस्था और जमीन के मामले दिल्ली सरकार को नहीं सौंपे गए।

केंद्र दिल्ली पर अपना नियंत्रण लेफ्टिनेंट गवर्नर के जरिए सुनिश्चित करता हैए लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार इस व्यवस्था को जिस हद तक खींच रही हैए उसे देखते हुए लगता नहीं कि यह ज्यादा दिन चलने वाली है। आज दिल्ली कई मामलों में पूर्ण राज्यों से आगे है। एलजी को अधिकार इसलिए नहीं मिले हैं कि वे एक निर्वाचित राज्य सरकार को अपनी ताकत का अहसास कराते रहें। उन्हें यह जिम्मेदारी इसलिए मिली हैए ताकि कुछ असाधारण स्थितियों में ठीक एक अभिभावक की तरह वे जनता के हितों की रक्षा कर सकें। केंद्र की बीजेपी सरकार अगर ऐसा सोचती है कि यह सब करके वह अरविंद केजरीवाल की ढिबरी टाइट कर देगी तो यह उसकी बहुत बड़ी गलती है।
SOURCE : navbharattimes.com

सोने से पैसा

सोने से पैसा

सरकार ने तिजोरियों और लॉकरों में निष्क्रिय पड़े सोने को सक्रिय अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने के लिए गोल्ड मॉनिटाइजेशन स्कीम शुरू करने का मन बनाया है। इस तरह की योजनाओं के बीते अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैंए फिर भी मोदी सरकार एक चांस लेना चाहती है। गौरतलब है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पिछले बजट में इसका प्रस्ताव रखा था। अब इस पर अमल की प्रक्रिया शुरू कर दी गई हैए लेकिन इसे व्यवहार में लाने के पहले सरकार इस बारे में जनता की राय जानना चाहती है।

मंगलवार को इसका ड्राफ्ट जारी किया गया। अगले 15 दिनों तक कोई भी इस बारे में सरकार को अपनी राय दे सकता है। जनता के फीडबैक के आधार पर ही इसका अंतिम प्रारूप तय होगा। ड्राफ्ट के मुताबिक कोई भी संस्था या व्यक्ति कम से कम 30 ग्राम सोना बैंक में जमा कर सकता हैए जो गहनेए सिक्के या बिस्किटए किसी भी रूप में हो सकता है। जमा करने की अवधि कम से कम एक साल होगी। बाद में इसे एक.एक साल के लिए बढ़ाया भी जा सकता है। बैंक जमा सोने पर अपने हिसाब से ब्याज दर तय करेंगेए जिसे नकद या सोने के रूप में लिया जा सकता है। लेकिन ब्याज का रूप सोना जमा करने के समय ही तय कर लेना होगा। देश में मानक ब्यूरो द्वारा मान्यता प्राप्त 350 हॉलमार्क केंद्रों में सोने की शुद्धता की जांच करवानी होगी।

बैंक वहां से जारी शुद्धता और वजन के सर्टिफिकेट के आधार पर ही सोना जमा करेंगे। सबसे बड़ी बात यह कि जमा सोने पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं लगेगा। लेकिन ध्यान रहेए आपको वही सोना वापस नहीं मिलने वालाए जो आपने जमा किया है। दरअसल बैंकों को जमा सोने को गलाकर सिल्ली के रूप में अपने पास रखने या सिक्के के रूप में बेचने की स्वतंत्रता रहेगी।

अनुमान है कि हमारे देश में अभी घरोंए मंदिरों और विभिन्न संस्थानों के पास करीब 20 हजार टन सोना पड़ा हैए जिसकी कीमत लगभग 60 लाख करोड़ रुपये है। अगर इसका एक छोटा हिस्सा भी बैंकों के पास आ गया तो उनकी कर्ज देने की क्षमता बहुत बढ़ जाएगी। इससे सोने के आयात में कमी भी आएगीए जो एक अर्से से भारत के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।

हर साल हम 800 से एक हजार टन सोना आयात करते हैं। आयात घटेगा तो विदेशी मुद्रा बचेगी। लेकिन यह सब तब होगा जब जनता इस स्कीम को हाथोंहाथ लेगी। भारतीय परिवारों में गहनों का एक आनुष्ठानिक और भावनात्मक महत्व भी होता है। इसलिए शायद ही कोई महिला बैंकों को अपने गहने गलाने के लिए देना पसंद करे।

हमारे देश में काले धन का एक बड़ा हिस्सा सोने के ही रूप में मौजूद है। ऐसा सोना रखने वाले भी इसे सरकार की नजर में लाने से बचेंगे। स्कीम की सफलता एक हद तक गोल्ड डिपॉजिट की ब्याज दरों पर भी निर्भर करेगी। लेकिन इस सारे अगर.मगर के बावजूद यह एक दिलचस्प योजना है और इसके नतीजों का इंतजार बेसब्री से किया जाएगा।
SOURCE : navbharattimes.com/editorial

Wednesday, 20 May 2015

नजीब.केजरीवाल जंग

नजीब-केजरीवाल जंग

दिल्ली में कार्यवाहक मुख्य सचिव की नियुक्ति को लेकर उपराज्यपाल नजीब जंग और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल में छिड़ी जंग देश के संघीय ढांचे के साथ.साथ उस टीम इंडिया भावना के भी प्रतिकूल हैए जिसका आह्वान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकसर करते रहते हैं। दिल्ली के मुख्य सचिव के अवकाश पर जाने के कारण उपराज्यपाल ने शकुंतला गैमलिन को कार्यवाहक मुख्य सचिव नियुक्त किया है। यह नियुक्ति इसलिए विवाद और विरोध का कारण बन गयी है क्योंकि दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार इसके विरुद्ध रही है। मुख्यमंत्री केजरीवाल न सिर्फ इस नियुक्ति का खुला विरोध कर रहे हैंए बल्कि उन्होंने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर आप सरकार को विफल करने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया है। उधर भाजपानीत केंद्र सरकार के गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने केजरीवाल के इस रुख को पूर्वोत्तर लोगों को आहत करने वाला करार देकर एक नया विवाद खड़ा करने की कोशिश की है। जाहिर हैए इस सबसे देश में संघीय व्यवस्था को लेकर कोई बहुत सकारात्मक संदेश नहीं जा रहा। रिजिजू दिल्ली के मुख्यमंत्री को नसीहत दे रहे हैं कि उन्हें पूर्ण राज्य और केंद्र शासित राज्य के बीच का फर्क समझते हुए पूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री की तरह आचरण करने से बचना चाहिए। बेशक यह सच है कि तमाम दलों के वायदों के बावजूद दिल्ली को आज तक पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया गया हैए जो हमारे राजनीतिक दलों.नेताओं की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान है।
इसके बावजूद कार्यवाहक मुख्य सचिव की नियुक्ति पर उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच टकराव को जायज नहीं ठहराया जा सकता। आखिर राज्य की महत्वपूर्ण नियुक्तियों में राज्य सरकार की सलाह मानने की परंपरा का दिल्ली में पालन क्यों नहीं किया जाना चाहिएघ् दिल्ली सरकार के विरोध के बावजूद गैमलिन को ही कार्यवाहक मुख्य सचिव नियुक्त करने की अपनी जिद का औचित्य केंद्र सरकार और उसके प्रतिनिधि उपराज्यपाल को भी बताना ही चाहिएघ् अब जबकि केजरीवाल ने गैमलिन की रिलायंस के स्वामित्व वाली निजी बिजली कंपनियों से निकटता और उन्हें लाभ पहुंचाने के लिए दिल्ली के बिजली मंत्री से 11000 करोड़ रुपये के ऋण गारंटी पत्र पर हस्ताक्षर कराने की नाकाम कोशिश का खुलासा किया हैए तब तो केंद्र और उपराज्यपाल की जवाबदेही और भी जरूरी हो जाती है। केजरीवाल के आरोपों का सच सामने आना ही चाहिए। पिछले दिनों ही प्रधानमंत्री मोदी ने अपना प्रिय जुमला फिर दोहराया था कि वह चाहते हैं कि केंद्र और राज्य सरकारें देश के विकास के लिए टीम इंडिया की तरह मिलकर प्रयास करें। बेशक यह बेहद सकारात्मक सोच है और देश के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी भी हैए लेकिन इसके वांछित परिणाम तभी मिल पायेंगेए जब इस पर अमल किया जायेगा। ऐसी सोच के सच का संदेश देश के दिल दिल्ली से ही जाये तो ज्यादा प्रभावी और परिणामदायी साबित होगा।
SOURCE : DAINIKTRIBUNEONLINE.COM

अरब देशों में अमेरिका का घटता दबदबा

अरब देशों में अमेरिका का घटता दबदबा

अभी हाल ही में खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य देशों के छह राष्ट्राध्यक्षों ने लगभग एक मत से यह निर्णय लिया है कि वे अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा आयोजित बैठक में निजी तौर पर भाग नहीं लेंगे। यह ये दर्शाता है कि पश्चिम एशिया में अमेरिका का प्रभाव अब उतार पर है। अमेरिका के राष्ट्रपति ने इस बैठक का आयोजन खाड़ी क्षेत्र के अपने सहयोगियों को ईरान से होने वाले एटमी.करार की जानकारी देने और इस पर उन्हें भरोसे में लेने के लिए किया था।
अमेरिका ने कभी अपनी छत्रछाया में पले.बढ़े इन देशों की आहत भावनाओं पर महरम लगाने के लिए सऊदी अरब के नेतृत्व में हूती.विद्रोह को कुचलने के लिए की जा रही सैन्य कार्रवाई का समर्थन जोरदार तरीके से किया। इस अभियान में अमेरिका ने महत्वपूर्ण सामरिक और गुप्त सूचनाएं देने के अलावा अदन की खाड़ी में अपनी नौसेना का जमावड़ा भी लगा दिया। जाहिर है इतना सब करने के बावजूद भी वह खाड़ी देशों के उस भरोसे को जीतने में सफल नहीं हो पाया।
खाड़ी क्षेत्र की राजशाहियों और गल्फ को.ऑपरेशन के सहयोगी देशों के अमेरिका से मोह भंग होने के कारण सर्वविदित हैं। इसकी शुरुआत उस घटनाक्रम से हुई जिसे पहले.पहल अरब स्प्रिंग का नाम दिया गया। मिस्र के पूर्व राष्ट्रपति हुसनी मुबारक के पीछे दृढ़ता से न खड़े होने पर अमेरिका की अनिर्णय की स्थिति और आखिर में उन्हें उनके हाल पर छोड़ देने से सऊदी अरब को खासी हताशा हुई थी। इसके बाद जब मिस्र में राष्ट्राध्यक्ष मोर्सी को अपदस्थ किया गयाए तब भी अमेरिका को दूसरे पक्ष की ओर खड़ा पाया गया था। वह भी तब जब उसे अच्छी तरह पता था कि सऊदी अरब मोर्सी का विरोध कर रहे मुस्लिम ब्रदरहुड नामक संगठन को कतई पसंद नहीं करता है। सीरियाई गृहयुद्ध के घटनाक्रम के चलते सऊदी अरब का अमेरिका से मोहभंग गहराता गया। सऊदी अरब को उम्मीद थी कि उसका दोस्त अमेरिका सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल.असद को हटाने के अभियान में उसकी मदद खुलकर करेगा। सऊदी राजशाही सीरिया की सरकार द्वारा हमेशा असहयोगात्मक रवैया अपनाने के कारण कभी भी उससे खुश नहीं रही थी। लेबनान में सीरिया का बढ़ता प्रभुत्व कभी भी

सऊदी अरब को रास नहीं आया क्योंकि तत्कालीन सऊदी सुल्तान रफीक पर अपना वरदहस्त मानते थे।
राष्ट्रपति ओबामा ने यह घोषणा कर रखी थी कि अगर असद सरकार विद्रोहियों पर रासायनिक हथियारों को प्रयोग करती है तो इसे चेतावनी रेखा पार करने वाला कृत्य माना जाएगा और ऐसा होने पर वह असद सरकार के गढ़ों पर सैन्य कार्रवाई करेगा। रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल भी हो गया और अमेरिका ने कुछ नहीं किया।
हालांकि सऊदी अरब और ईरान दोनों ही सार्वजनिक रूप से एक.दूसरे के प्रति बड़े मृदुभाषी बने रहते हैं लेकिन तथ्य यह है कि इस इलाके पर अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए दोनों के बीच कड़ी प्रतिद्वंद्विता है। इस सिलसिले में सांप्रदायिक वर्गीकरण एक महत्वपूर्ण कारक है क्योंकि सऊदी अरब की राजशाही अपने को संसार के सभी मुसलमानों का अगुआ मानती है और ईरान भी खुद को सभी शियाओं का संरक्षक समझता है। संसार भर के मुसलमानों की कुल संख्या का लगभग 10 से 15 प्रतिशत भाग ही शियाओं का है और केवल चार देशों.ईरानए इराकए बहरीन और अजरबेजान में यह समुदाय बहुसंख्यक है। ज्यादातर सुन्नी देशों में शियाओं को प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है और कुछ ही साल हुए हैं जब उन्होंने अपना अधिकार जताना शुरू किया है। इसमें कोई शक नहीं कि एक इस्लामिक गणतंत्र के रूप में ईरान का उद्भव इस दृढ़ता के लिए बहुत मायने रखता है।
ईरान के बढ़ते प्रभाव से सऊदी अरब का चिंतित होना स्वाभाविक है क्योंकि इसके पूर्वी प्रांत में जहां इस सल्तनत के सबसे ज्यादा तेल कुएं केंद्रित हैंए वहीं पर इस देश के शियाओं की सबसे ज्यादा आबादी है। सऊदी अरब को डर है कि अगर ईरान यमन में अपने प्रभाव से हलचल कर सकता है तो फिर वह सऊदी अरब में भी ऐसी ही कुछ करने की कूवत रखता है। उसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर ईरान अमेरिका से एटमी करार करने में कामयाब रहता है तो यह संधि परमाणु हथियार बनाने की उसकी सामर्थ्य बरकरार रखने की एक तरह से इजाजत होगी और इस सारे इलाके का शक्ति.संतुलन सदा के लिए ईरान के पक्ष में झुक जाएगा। इसलिए जब ईरान और पी.5़1 देशों के बीच वार्ता प्रगति पर थी तो यह उम्मीद की जा रही थी इस रफ्तार पर जून के आखिरी सप्ताह तक सफलता मिल जाएगी। इसलिए सऊदी अरब ने सोचा अब तो ष्कुछष् तो्य करना ही होगा। और यह ष्कुछष् यमन में दखलअंदाजी के रूप में सामने आया। इस अभियान में इस्राइल ने भी बढ़.चढ़कर सऊदी अरब की हल्लाशेरी करने के अलावा सहायता भी दीए क्योंकि इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी ईरान से होने वाले एटमी करार का विरोध करने के लिए अपनी वजहों से अति प्रभावशाली अभियान अलग से छेड़ रखा है।
सऊदी अरब ने मीडिया में बहुत बड़ा प्रचार अभियान चला रखा है ताकि बड़ी ताकतों को यह मनवाया जा सके कि यमन के हूती विद्रोह के पीछे ईरान का हाथ है और वही हूती लड़ाकों को राजनीतिकए सामरिक और सैन्य मदद दे रहा है। अमेरिका ने ईरान को हूतियों की मदद करने के लिए चेतावनी दी है।
ओबामा पहले से ही देश के अंदर यह संधि कर भारी दबाव का सामना कर रहे हैं क्योंकि इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस करार के खिलाफ रिपब्लिकन सीनेटरों को अपने पक्ष में कर रखा है। ऐसे हालातों में राष्ट्रपति ओबामा को यह श्रेय जाता है कि इतने सारे दबावों के बावजूद उन्होंने ईरान से वार्ता जारी रखी हुई है। लेकिन ईरान की तरफ से की गई एक भी गलती ओबामा को हाथ पीछे खींचने को मजबूर कर देगी और यह वार्ता वहीं टूट जाएगी। भले ही ईरान में भी हर कोई इस एटमी करार के पक्ष में नहीं है परंतु ज्यादातर नागरिक इसका समर्थन कर रहे हैंए खासकर अली खमेनाईए जिनकी राय इस देश में सबसे ज्यादा मायने रखती है और जो ईरान का सर्वोच्च नेता भी है।
खाड़ी.देशों द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति पर सार्वजनिक रूप से दिखाया गया अविश्वास एक अभूतपूर्व घटना है और यह ओबामा और ईरान के लिए एक.सी चुनौती है।
SOURCE : DAINIKTRIBUNEONLINE.COM

Saturday, 16 May 2015

द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश

द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम देने की कोशिश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चीन में जिस तरह का स्वागत हुआ है उससे इस बात की उम्मीद बढ़ गई है कि उनकी यह तीन दिवसीय यात्रा द्विपक्षीय रिश्तों को नया आयाम देने वाली साबित होगी। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग प्रोटोकॉल तोड़कर पहली बार राजधानी बीजिंग के बाहर अपने गृहनगर शियान में किसी विदेशी मेहमान के स्वागत के लिए पहुंचेए इससे भी इस दौरे की अहमियता समझी जा सकती है।

जुलाई 2014 के बाद मोदी और जिनपिंग के बीच यह तीसरी मुलाकात है। यात्रा से पहले चीनी मीडिया को दिए इंटरव्यू में भारतीय प्रधानमंत्री कह भी चुके हैं कि चीन के उनके इस दौरे से केवल चीन.भारत दोस्ती ही प्रगाढ़ नहीं होगी बल्कि यह एशिया में विकासशील देशों के साथ ही दुनिया भर में संबंधों के लिए मील का पत्थर साबित होगा। चीन दौरे के बाद प्रधानमंत्री मोदी मंगोलिया और दक्षिण कोरिया भी जाएंगे। हालांकि चीन के साथ आधिकारिक समझौते की तस्वीर शुक्रवार को वहां के प्रधानमंत्री ली कचियांग के साथ होने वाली वार्ता के बाद ही साफ हो सकेगी। बहरहालए उससे पहले शी जिनपिंग के साथ उनकी सीमा विवादए सामरिकए आर्थिकए प्राकृतिक आपदा और आतंकवाद के मुद्दे पर बातचीत हुई है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जहां अरुणाचल प्रदेश में नत्थी वीजा का मामला उठाया वहीं चीन द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में किए जाने वाले निवेश पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने भारत.चीन के बीच लगातार बढ़ते व्यापार घाटे और भारत में चीनी निवेश पर भी चिंता जताई। साथ ही संयुक्त राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और परमाणु आपूर्ति समूह में भारत का समर्थन करने की भी मांग की। हालांकि चीन ने साफ किया है कि सीमा विवाद पर इतनी जल्दी नतीजे की उम्मीद बेमानी है। उसे हल करने में समय लगेगा। भारत भी जटिलता को देखते हुए इसको शांतिपूर्वक बातचीत के जरिए ही हल करने का इच्छुक है। इस बीच दोनों देश आर्थिकए सामरिकए पर्यटन और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। यही वजह है कि व्यापार और निवेश के एजेंडे को सबसे ऊपर रखा गया है। आज भारत.चीन के बीच करीब 70 अरब डॉलर का व्यापार होता हैए जो आठ फीसदी की दर से लगातार बढ़ रहा हैए लेकिन यह चीन के पक्ष में झुका है। यानी भारत चीन को जितना निर्यात करता हैए उससे कईगुना अधिक चीन भारत को निर्यात करता है।

इससे भारत को करीब 48 अरब डॉलर का व्यापार घाटा उठाना पड़ता है। दरअसलए चीन ने भारत द्वारा कृषिए फार्मा और आईटी आदि उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा रखी है। भारत की मांग है कि वह इन उत्पादों के लिए भी अपने बाजार खोले तभी व्यापार में संतुलन आएगा। यदि चीन आर्थिक संबंधों को आगे ले जाना चाहता है तो उसे इन मांगों पर गौर करना चाहिए। वहीं चीन से भारत में होने वाला निवेश भी एक बड़ा मुद्दा है। आज मोदी सरकार देश में जिस तरह के विनिर्माण और ढांचागत विकास करना चाहती हैए उसमें चीनी निवेश की काफी जरूरत है।

इस यात्रा के दौरान हाईस्पीड ट्रेन और स्मार्ट सिटी सहित करोड़ों रुपए के मूल्य के कई समझौते होने हैं। पिछले साल शी जिनपिंग जब भारत दौरे पर आए थे तब विभिन्न क्षेत्रों में 20 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी। इन समझौतों को जल्द से जल्द जमीन पर उतारने की जरूरत है। नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की व्यक्तिगत केमिस्ट्री को देखते हुए उम्मीद की जा रही है कि इन मुद्दों पर भारत को चीन का सकारात्मक सहयोग मिलेगा।
SOURCE : HARIBHOOMI.COM

काबुल में निशाने पर हम!

काबुल में निशाने पर हम!

काबुल के पार्क पैलेस गेस्टहाउस पर हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर इस बात को रेखांकित किया है कि अफगानिस्तान सरकार तालिबान व अन्य आतंकी गुटों की चुनौती का सामना करने में सक्षम नहीं है। इस आतंकी हमले में 14 लोग मारे गएए जिनमें 9 विदेशी हैं। मरने वालों में चार भारतीय नागरिक थे। भारत की खुफिया एजेंसी का मानना है कि इस आतंकी हमले का मुख्य निशाना भारत के राजदूत अमर सिन्हा थेए जो वहां अफगानी गायक अल्ताफ हुसैन के कार्यक्रम में शामिल होने वाले थे। सौभाग्य से अमर सिन्हा वहां नहीं गए।

जुलाई 2008 में काबुल के भारतीय दूतावास पर आतंकी हमला हुआ था। पिछले साल नरेंद्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लिए जाने के ठीक पहले हेरात में भारतीय कॉन्सुलेट पर आतंकी हमला किया गया था। इसलिए यह आशंका निराधार नहीं है कि पार्क पैलेस गेस्टहाउस पर हुआ आतंकी हमला उन्हीं संगठनों की करतूत हैए जिन्होंने पहले भी भारतीय ठिकानों पर हमला किया था। भारतीय दूतावास पर हुए हमले के संदर्भ में अफगानिस्तान सरकार की जांच एजेंसी ने हक्कानी समूह को इसके लिए जिम्मेदार पाया थाए जिसका पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से सीधा रिश्ता है।

अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत अग्रणी भूमिका निभा रहा हैए जो पाकिस्तान को पसंद नहीं है। भारत की भूमिका को सीमित करने में अन्य मोर्चों पर विफल रहने के बाद अब आईएसआई ने आतंकी गुटों का इस्तेमाल कर अफगानिस्तान में भारत के कूटनीतिज्ञों व नागरिकों को निशाना बनाया है। संभवतरू पाकिस्तान चाहता है कि भारत व अन्य देश अफगानिस्तान से बाहर हो जाएंए ताकि एक बार फिर वहां की राजनीतिक सत्ता में पाकिस्तान.समर्थक तत्वों का प्रभुत्व स्थापित हो जाए।

ऐसा लगता है कि पाकिस्तान सरकार ने अपने यहां बढ़ती आतंकी वारदातों से कोई सबक नहीं सीखा है और वह आज भी आतंकवादी तत्वों का इस्तेमाल करके अपना कूटनीतिक लक्ष्य प्राप्त करना चाहती है। पिछले साल अमेरिकी सेना की वापसी के बाद अफगानिस्तान में तालिबान व अन्य आतंकी गुटों की गतिविधियों में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है। पाकिस्तान संभवत इस आग में घी डालने का काम कर रहा है। पाकिस्तान को यह समझना चाहिए कि अफगानिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता फैलने का सबसे अधिक नकारात्मक असर उसी पर पड़ेगा। अफगानिस्तान में तालिबान शासन की वापसी पड़ोसी देशों के लिए ही नहींए बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। इस संभावित खतरे से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयास जरूरी हैं।

अफगानिस्तान सरकार के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह इस चुनौती का सफलता के साथ सामना कर सके। अफगानिस्तान पुलिस व सुरक्षा बलों की क्षमता बढ़ाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में अभी तक अपेक्षित सफलता नहीं मिली है। पाकिस्तान को यह समझना होगा कि अफगानिस्तान भारत के खिलाफ युद्ध का मैदान नहीं है। अफगानिस्तान की धरती पर दोनों देश आपसी सहयोग करके नई इबारत लिख सकते हैं।
SOURCE : NAIDUNIYA.COM