Thursday, 4 June 2015

सुरक्षा चुनौतियों के मुकाबले को बने रणनीति

सुरक्षा चुनौतियों के मुकाबले को बने रणनीति

सोवियत संघ का विघटन हुए 25 साल से ज्यादा अरसा हो गया है। तब से अब तक भारत ने तेजी से तरक्की करने वाली पूर्व और दक्षिण एशियाई देशों की आर्थिकी से एकीकरण के लिए एक नई और खोजपूर्ण आर्थिक नीति की सृजना सफलतापूर्वक की है। एसियान संगठन के एक संवाद सहयोगीष् के नाते इसके शीर्ष दस देशों के साथ हमारी आर्थिकी अब बड़े स्तर पर अनुकूलन कर चुकी है। टाइगर इक्नॉमिकीष् के नाम से मशहूर जापान और कोरिया से हमारी बृहद आर्थिक भागीदारीष् बनी हुई है। 21वीं सदी की महाशक्ति चीन से हमारे आर्थिक संबंध और आगे बढ़ने की ओर अग्रसर हैं। पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन का सदस्य होने की वजह से भारत अपने देश की समुद्री सीमा से लेकर अमेरिका के पश्चिम में स्थित प्रशांत महासागर वाले तटों तक फैले समूचे इंडो.पैसीफिकष् क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी नई गतिशील नीतियां निर्धारण करने में सक्रिय रूप से भाग लेता है।
हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने देश को दोनों तरफ से यानी पूर्व और पश्चिम में भूमि और सामुद्रिक सीमाओं पर दरपेश सुरक्षा चुनौतियों के विषय में जानकारी दी थी। चीन से होने वाली चुनौती के बारे में समझाते हुए डोभाल ने कहा कि उस देश से हमारी सीमा काफी लंबी और दुरूह क्षेत्रों से होकर गुजरती है। उन्होंने भारत की पूर्वी सीमा पर चीन से शांति और सौहार्द बनाए रखने पर जोर दिया लेकिन साथ ही उसके द्वारा अरुणाचल प्रदेश पर अपना हक जताए जाने की आलोचना भी की। चीन के आक्रामक रवैयेष् का तोड़ निकालने के लिए भारत ने जापान से लेकर वियतनाम और म्यांमार तक फैले हुए उसके सामुद्रिक पड़ोसियों से निकट संबंध स्थापित कर लिए हैं। अमेरिका से सलाह.मशविरा करने के पश्चात इन प्रयासों को और भी बल मिला है ताकि हमारी पूर्वी सीमा और उससे आगे के क्षेत्र में स्थिरता के वास्ते शक्ति.संतुलन बनाया जा सके। लेकिन अपनी पूर्वी सीमाओं पर आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ करते वक्त हमें यह ध्यान रखना होगा कि रक्षा तंत्र के आधुनिकीकरण का फिर भी कोई विकल्प नहीं है।
हालांकि पूर्वी सीमा और उससे आगे के क्षेत्र में सुरक्षा और सहयोग के तंत्र को सुदृढ़ किया गया हैए लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हमारी पश्चिमी सीमा और उससे परे की चुनौतियों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। अजीत डोभाल ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना हटने के बाद पेश आने वाली सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को लेकर आगाह किया है। यह स्पष्ट है कि राष्ट्रपति ओबामा की योजना है कि अफगानिस्तान से फौज वापिस निकालते समय ठीक उसी वक्त वहां पर अमेरिका.चीन.पाकिस्तान के गठजोड़ वाली एक ऐसी अनधिकृत व्यवस्था कायम कर दी जाए जो तालिबान को अपने अनुकूलष् बनाने की खातिर दक्षिणी.पूर्वी अफगानिस्तान के बड़े इलाके का नियंत्रण उन्हें सौंप दे। इस योजना का हिस्सा यह भी है कि अमेरिकी सेना हटने के बाद अफगानिस्तान में पीछे छूटने वाले हथियारों का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान को हस्तांतरित कर दिया जाए जिसमें एफ.16 लड़ाकू हवाई जहाजए हवा.से.हवा में मार करने वाली मिसाइलेंए प्रशिक्षण जेट विमान और सैनिक ले जाने वाली बख्तरबंद गाडि़यां इत्यादि शामिल हैं। इससे भी ज्यादा यह कि जहां अमेरिका जकीउर रहमान लखवी जैसों पर कानूनी मुकदमा चलाये जाने जैसे सिर्फ सहानुभूति भरे जुबानी और प्रतीकात्मक संकेत देता आया है वहीं उसका प्रयास है कि इस विषय में असल में कुछ न किया जाए ताकि कहीं पाकिस्तान की असली हुक्मरान मानी जाने वाली सेना को कोई परेशानी न होने पाए। यदि भारत अब भी आईएसआई द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को खत्म करने में किसी प्रभावशाली अमेरिकी समर्थन की उम्मीद करता है तो यह उसकी खुशफहमी  होगी।
भारत की सीमा से सटे अफगान.पाक क्षेत्र के अलावा ईरान से लेकर अलजीरिया तक के बृहत्तर मध्य.पूर्वष् के इलाके में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई हैए वहां का माहौल गृह.युद्धए वर्ग.संघर्ष और फारस.अरब प्रतिद्वंद्विता से बुरी तरह बिगड़ा हुआ है। भावी अमेरिका.ईरान एटमी करार ने अरब देशों में खासकर तेल संपदा से संपन्न खाड़ी सहयोग परिषद की सदस्य राजशाहियों में हड़कंप मचा दिया है। इस संधि की वजह से इस इलाके में शक्ति संतुलन का समीकरण ठीक वैसे ही बदल सकता है जैसा कि निक्सन.माओ के बीच 1970 के दशक में हुए एक समझौते के बाद हुआ था। सऊदी अरब में इसे लेकर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है क्योंकि जिस तरीके से ज्यादातर फूंककर कदम रखने वाले सऊदी अरब ने यमन पर सैन्य कार्रवाई की हैए उससे लगता है कि वह बढ़ते हुए ईरानी प्रभाव के प्रति सशंकित है। लेकिन यहीं पर सऊदी अरब से हिसाब लगाने में गलती हुई है और इसके चलते बिना शक उसे आगे जाकर बड़ी कीमत चुकानी होगी।
अमेरिका ने यमन के मामले में खाड़ी देशों की राजशाहियों के पीछे खड़े होने का कोई हीला नहीं किया। यहां तक कि इस मुद्दे पर सऊदी अरब का साथ इस्लामिक बंधुओं जैसे कि पाकिस्तान और मिस्र ने भी नहीं दिया। लग रहा है कि अरब देशों को यह एहसास नहीं हो रहा है कभी उनका ग्राहक रहा अमेरिका विश्व में सबसे बड़ा तेल.उत्पादक देश बनने के बाद अब प्राकृतिक गैस का भी सबसे बड़ा निर्यातक मुल्क बनने जा रहा है और अब उसे सचमुच में अरब देशों के अभिजात राजपरिवारों की चिंता करने की जरूरत और आगे नहीं है। फिर भी भारत इन घटनाओं के प्रति आशावादी नजरिया नहीं रख सकता। हमारे तेल आयात का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा इसी इलाके से आता है। वहां रोजी.रोटी कमाने गए हमारे वो 60 लाख कामगार रहते हैंए जो 45 बिलियन डॉलर सालाना देश में कमाई के तौर पर वापिस भेजते हैं। इससे बढ़कर यह कि जिस इराक को शिया.सुन्नी तनाव का केंद्र बिंदु कहा जाता हैए उसके प्रति यह संभावना व्यक्त की जाती है कि वह आने वाले समय में भारत का मुख्य सहयोगी बन सकता है। इसलिए भारत को खाड़ी क्षेत्र की राजशाहियोंए ईरान और इराक से संबंध बनाने की खातिर एक नई और कल्पनाशील राजनयिक पहल करने की जरूरत है।
आईएसआईएल का नियंत्रण अब आधे सीरिया और लगभग पूरी सीरिया.इराक सीमा पर हो गया है। मोसूल और निमरूद के ऐतिहासिक शहर अस्सीरिया पर इसका राज पहले ही चुका हैए हाल ही में इराक के सुन्नी बहुल अनबार प्रांत की राजधानी रामादी पर भी इसने कब्जा कर लिया है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि शिया बहुल देश इराक की राष्ट्रीय सेना जो अमेरिकी हथियारों से लैस हैए वह भी तब तक जी.जान से युद्ध करने स्थिति में नहीं हो पाती जब तक कि ईरान में प्रशिक्षित इराकी शिया लड़ाके उसके पीछे न खड़े हों।
तालिबानए जो इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी.814 के अपहरणकर्ताओं से मिले हुए थेए ने अफगास्तिान में रह रहे भारतीय नागरिकोंए राजनयिकों और दूतावास की इमारत पर बार.बार हमले किए हैं। यह मानने की  कोई वजह नहीं कि अब वे आगे बदल जाएंगे क्योंकि ओबामा प्रशासनए चीन की शी जिनपिंग सरकार और जनरल रिजवान अख्तर की अगुआई वाली आईएसआई और अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी की कृपा से उन्हें अफगास्तिान का नियंत्रण अब ठीक वैसे ही मिलने जा रहा है जैसे कि आईएसआईएल ने सीरिया और इराक में किया है।  क्या हमें अपनी पश्चिमी सीमा और उससे परे मौजूद इस गंभीर समस्या से निबटने के लिए एक बृहद एक्ट वैस्टष् नीति नहीं बनानी चाहिएघ्
SOURCE : http://dainiktribuneonline.com/2015/06/

Wednesday, 3 June 2015

अब सपने भी नहीं रहे अपने!

अब सपने भी नहीं रहे अपने!

इन दिनों विभिन्न राज्यों की माध्यमिक शिक्षा परिषदों द्वारा संचालित हाई स्कूल व इंटर परीक्षाओं के नतीजे आ रहे हैं। इनके टॉपर्स में ज्यादातर बड़ी-बड़ी कम्पनियों की बड़े-बड़े पैकेजों वाली ‘एग्जिक्यूटिव’ किस्म की नौकरियां करना चाहते हैं और आईएएस व आईपीएस जैसी ‘सम्मानजनक’ सेवाओं का भी पहले जैसा सम्मान नहीं कर रहे। राजनीति और उसके नायकों से घृणा करना सिखाकर युवाओं को उससे विमुख करने की कवायदों को इन नतीजों के आईने में देखें तो वे इस हद तक सफल हो गयी हैं। अब कोई भी टापर नेता बनकर गंदी राजनीति की सफाई नहीं करना चाहता।
एक दौर था जब नई पीढ़ी के अराजनीतिकरण को बढ़ाने वाले एक गीत में एक बच्चा अपनी मां से कहता था कि वह गोली चलाना सीखेगा, क्योंकि उसे लीडर नहीं, फौजी आफिसर बनना है! लेकिन अब कोई टापर फौजी आफिसर बनने की इच्छा भी नहीं दर्शाता। उस समाजसेवा को छोड़, जिसमें कोई एनजीओ बना लेने पर बदले में मेवा खाने की गारंटी हो जाती है, उसकी किसी समाज कार्य में भी दिलचस्पी नहीं है। क्या अर्थ है इसका? अभी दो-तीन दशक पहले तक टॉपर्स के अरमानों में खासा वैविध्य हुआ करता था। उनमें कोई अच्छा वकील बनना चाहता था तो कोई अध्यापक। कोई बड़ा वैज्ञानिक बनना चाहता था तो कोई डाक्टर। कोई न कोई किसानों और मजदूरों के लिए अपना जीवन अर्पित करने का जज्बा भी दिखाता ही था। मतलब देश और समाज उनके सपनों में पूरी शिद्दत से शामिल थे। लेकिन अब जैसे सारे सरोकार उस सफलता के हाथों के खिलौने बन गये हैं, जिसे गाड़ी, नौकर, बंगला, बैंक बैलेंस और लाकर आदि से मापा जाता है।
मैकाले की क्लर्क पैदा करने वाली शिक्षा पद्धति झेलने को अभिशप्त देश की आजादी के शुरुआती बरसों की सरकारों ने जनदबाव में ही सही, अपने तईं अच्छे नागरिकों का निर्माण कर सकने वाली शिक्षा का एक अपेक्षाकृत बेहतर ढांचा खड़ा किया था। यकीनन, उस ढांचे में भी कमियां थीं, जिन्हें दूर करने की जरूरत भी जताई जाती थी।
लेकिन भूमंडलीकरण व्यापा तो सारा जोर ऐसे संस्थानों पर हो गया, उक्त कम्पनियों के लिए अच्छे प्रोफेशनल और उनके उपयुक्त मानसिकता पैदा करना ही जिनका एकमात्र ध्येय है। इस कारण मानविकी पढ़ाने वाले विश्वविद्यालयों व कालेजों में अब पढ़ाई नहीं, सिर्फ प्रवेश व परीक्षा होती है और वे अयोग्य डिग्रीधारियों की उत्पादन इकाइयों में बदल गये हैं। दूसरी ओर उक्त संस्थानों में प्रशिक्षित टॉपर्स के ज्ञान व प्रतिभा को ‘किसी भी कीमत पर खरीदकर’ बड़ी कम्पनियां हमारी ही लूट में इस्तेमाल कर रही हैं। इस खरीद-बिक्री से ‘अभिभूत’ कोई टापर पायलट भी होना चाहता है तो वायुसेना का नहीं, किसी एयरलाइंस का। क्योंकि वायुसेना के पायलट को जान जोखिम में डालकर दुश्मन के इलाके में बम बरसाने जाने के एवज में निजी एयरलाइनों के उन पायलटों से कम पैसे मिलते हैं । जो किसी देश में बर्ड फ्लू फैला हो तो विमान को उड़ाकर वहां ले जाने का तनाव झेलने से भी इनकार कर देते हैं!
गौर कीजिए, टॉपर्स के शहरों के अखबारों में खबरें छप रही हैं कि उन्होंने इस ‘पराक्रम’ से अपने शहर का नाम रौशन किया है। उनके हंसते-मुस्कुराते चित्रों के साथ सफलता का सारा श्रेय किसी कोचिंग संस्थान, माता-पिता, गुरुजनों या प्रियजनों को देने वाले उनके बयान भी छप रहे हैं। किसी का दृष्टिकोण बहुत सकारात्मक है तो वह इसे इस तरह भी देख सकता है कि जो प्रतिभाएं कभी देश का नाम रौशन करती थीं, अपने दुर्दिनों में भी वे कम से कम अपने शहर का नाम तो रौशन कर ही रही हैं।
लेकिन किसी टापर द्वारा अपने सारे संकल्प जगाकर किसी परीक्षा में ऊंचा स्थान पा लेने या उसके बूते महज अपने सुखद व सुन्दर भविष्य की गारंटी देने वाली एक अदद बड़ी नौकरी उगाह लेने से उसके शहर का नाम कैसे रौशन होता है? क्या उसके शहर की कामनाओं को सुनहरे पंख तभी हासिल होते हैं जब कोई कम्पनी उसके किसी टापर को कलाई मरोड़कर उससे छीन लेती है? क्या इससे शहर को कोई ज्ञात-अज्ञात, प्रत्यक्ष या परोक्ष सुरक्षा हासिल होती है?
अनुभव तो कहता है कि ये बड़ी नौकरियां अपने शहर की कौन कहे, आसपास के शहरों की सेवा का भी मौका नहीं देतीं। मुक्तिबोध कहते थे कि नौकरी प्रतिभा व आत्म-सम्मान को सबसे ज्यादा काटने वाली चीज है। मैथिलीशरण गुप्त तो उस शिक्षा का नाश चाहते थे, जो महज नौकरी के लिए होकर रह जाये। तब टापर अपनी प्रतिभा व आत्म-सम्मान की कीमत पर नौकरी से जो कुछ हासिल करते हैं, उनके शहर का नाम भला कैसे रौशन हो सकता है? फिर, सामाजिक जिम्मेदारियों से भागती सरकारों और लूटो-खाओ की आंधी को ग्लोबल बना डालने वाली कम्पनियों की सेवा करके कोई टापर, शहर व देश की तो छोडि़ए, अपना नाम भी रौशन कर सकता है क्या?
हमारे टापर तक महज खुद को रौशन करने के लिए सारा उजाला अपनी मुट्ठी में कैद रखने के फेर में हैं, तो यह एक बहुत बुरी और निराशाजनक खबर है।
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म्यांमार के रोहिंग्या और मूकदर्शक सरकारें

म्यांमार के रोहिंग्या और मूकदर्शक सरकारें

बोट पीपल आर नॉट फ्रॉम म्यांमारष्। यानीए नावों द्वारा भागने वाले शरणार्थीए म्यांमार के नहीं हैंष्! उग्र जुलूस के हाथों में ये तख्तियां और डराती हैं। खासकर तबए जब जुलूस के साथ.साथ धर्म के ठेकेदार भी चल रहे हों। म्यांमार में धर्म के ठेकेदार वहां के बौद्ध लामा हैं। दुनिया भर में बौद्ध धर्म के प्रवर्तकों की छवि शांति के पुजारी के रूप में बनी हुई है। मगरए म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर जिस तरह से सितम ढाये जा रहे हैंए उससे शांति के पुजारियों के बारे में भ्रम टूटता दिख रहा है। इसे लेकर दलाईलामा तक को चिंता हो गई है। दलाईलामा ने म्यांमार में विपक्ष की नेता आंग सांग सू ची से अपील की है कि वे इसमें हस्तक्षेप करें। इस सवाल पर सू ची की चुप्पी लोकतंत्र के लिए उनकी लंबी लड़ाई को धो.पोंछकर बराबर कर रही है।
मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र तक ने चेतावनी दी है कि रोहिंग्या के खिलाफ म्यांमार में बने माहौल से सामाजिक ताना.बाना टूट रहा है। म्यांमार के राखिन प्रांत में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध 2012 से दंगे शुरू हुए। वहां की सरकार ने माना है कि अब तक 240 लोग मारे जा चुके हैं। 28 जून 2012 और उसके बाद लगातार हुए दंगों में 700 से अधिक रोहिंग्या मुसलमानों की मौतए 1200 के लापता होने और सवा लाख के पलायन हो जाने का दावा लंदन स्थित ष्बर्मी रोहिंग्या आर्गेनाइज़ेशन यूकेष्ष् के अध्यक्ष तून खिन ने किया है। इस नरसंहार पर संयुक्त राष्ट्र तक सीधी कार्रवाई से बच रहा है। प्रधानमंत्री मोदी पिछले साल नवंबर में म्यांमार गये थेए मगर अफसोस कि रोहिंग्या दमन पर बोलना उन्हें मुनासिब नहीं लगा।
इस पूरे प्रकरण में प्रत्यक्ष भुक्तभोगी भारत रहा है। जो रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार छोड़कर भागे हैंए उनमें से ज्य़ादातर लोगों ने भारत के सीमावर्ती राज्यों त्रिपुराए मणिपुरए मिजोरम में शरण ली है। आग म्यांमार में लगीए लेकिन उसकी तपिश मुंबई में 2012 में देखने को मिलीए जब इस बात पर उग्र हुए कुछ लोगों ने फसाद किये। इस फसाद में दो लोग मारे गयेए और 50 से अधिक घायल हुए। जबकि महाराष्ट्र पुलिस का म्यांमार या असम से कोई लेना.देना नहीं था। मुंबई के आज़ाद मैदान में मीडिया वालों से बदसुलूकी के लिए फसादी यही तर्क दे रहे थे कि असम और म्यांमार में जो कुछ हुआए उसकी मीडिया कवरेज ठीक से नहीं की गई थी। मतलबए दंगे पर कवरेजष् फसादी तय करें।

भारत पहले से ही बांग्लादेश से पलायन किये मुसलमानों को पूर्वोत्तर में झेल रहा है। अब रोहिंग्या गले आ पड़े हैं। आबादी के उत्पादनष् में आगे रहने वाला बांग्लादेश सिर्फ हमारे लिए समस्या की जननी नहीं हैय म्यांमारए थाईलैंड भी उससे त्रस्त हैं। अराकान की पहाडि़यों में रोहिंग्या मुसलमान कब आकर बसेए इसका कोई निश्िचत आधार नहीं मिलता। 1891 में अंग्रेज़ों ने अराकान की पहाडि़यों में जब सर्वे कराया थाए तब वहां मुसलमानों की संख्या 58255 बताई गई। ये मुसलमान क्या रोहिंग्या थेघ् पक्के तौर पर कोई नहीं कहता। पचास के दशक में रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यांमार से अलग राष्ट्र के लिए उत्तरी अराकान में मुजाहिद पार्टीष् का गठन किया था।
आज अराकान की पहाडि़यों में आठ लाख की संख्या में बसे रोहिंग्या मुसलमानों के बारे में म्यांमार सरकार यही दावा करती है कि ये लोग बांग्लादेश से आये हुए शरणार्थी हैं। बांग्लादेश सरकार ने चिटगांव की पहाडि़यों से लेकर देश के कई इलाकों में रोहिंग्या मुसलमानों को बसाने में जिस तरह की सक्रियता दिखाई हैए वह इस तथ्य को मज़बूत करता है कि रोहिंग्या मुसलमानों के पूर्वज बांग्लादेश के निर्माण से पहलेए इन इलाकों में रहते थे। बांग्लादेश की विपक्षी नेता बेगम ख़ालिदा जिया के पति जनरल जिय़ा जब बांग्लादेश के शासनाध्यक्ष थेए तब उन पर म्यांमार ने आरोप लगाया था कि वे रोहिंग्या मुसलमानों को भड़का रहे हैं और अलगाववाद को हवा दे रहे हैं।
रोहिंग्या अलगाववाद को समर्थनष् बांग्लादेश जातीयताबादी दोल ;बीएनपीद्ध की पार्टी लाइन हैए जिसकी नेता बेगम ख़ालिदा जिय़ा हैं। बीएनपी की सहयोगी जमात.ए.इस्लामीष् की सोच यही है कि म्यांमार में अराकान की पहाडि़यों से लेकर असम तक मुसलमानों की आबादी को मज़बूत किया जाएए ताकि समय आने पर अलगाववाद को बड़े स्तर पर अंजाम दिया जा सके। क्या इस सोच को पाकिस्तान से भी ऊर्जा मिल रही हैघ् पाकिस्तान स्थित जमात.ए.इस्लामीए जमात.उल.दावाए जमीअतेउल उलेमा इस्लाम ने 2012 में म्यांमार के दूतावास को उड़ाने की धमकी दी थीए उससे इस शंका की पुष्िट होती है। मतलबए इस्लामी अतिवाद को एक नया मुद्दा मिला हैए जिससे सरकारें हिल रही हैंए और ओआईसीष् ;ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशनद्ध जैसा संगठन भी दबाव में आ गया है।
म्यांमार का राखिन प्रांत रोहिंग्या मुसलमानों के कारण राजनीतिक रूप से गरम रहा है। राखिन बौद्धों से रोहिंग्या मुसलमानों की अदावत नई नहीं है। ग़ौर करें तो द्वितीय विश्वयुद्ध से ही दोनों समुदाय आपसी दुश्मनी निकालते रहे हैंए जिसमें हज़ारों जानें गई हैं। इससे पहले इस्लामिक राष्ट्रों का संगठन ओआईसीष् बर्मी मुसलमानों के लिए क्यों नहीं चिंतित हुआए यह भी सोचने वाली बात है। इस बात की सराहना होनी चाहिए कि म्यांमार के राष्ट्रपति थेन सिन ने ओआईसीष् को हालात का जायज़ा लेने के लिए आमंत्रित किया है।
ओआईसीष् की सक्रियता और बदलते तेवर को नजऱअंदाज़ नहीं कर सकते। इससे मुसलमान मुल्कों को भारत द्वारा जवाब देने की नौबत आ सकती है कि रोहिंग्या दमन के समय आप खामोश क्यों थे। यह अच्छी बात है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बांग्लादेश और म्यांमार से सटे पूर्वोत्तर के राज्यों को सतर्क रहने को कहा है। त्रिपुराए मिजोरमए मणिपुर जैसे राज्यों ने गृह मंत्रालय को दो हज़्ाार रोहिंग्या शरणार्थियों के घुस आने की ख़बर 2012 में ही भेजी थी। पूर्वोत्तर में जमा हो रही बाहरी आबादी परमाणु बम से कम नहीं है। अब यह न कहें कि पिछली सरकार की ग़लती थीए तो हम क्या करें!
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Tuesday, 2 June 2015

रोजगार भी सृजित करें उद्योग

रोजगार भी सृजित करें उद्योग

कांग्रेस नेताओं द्वारा एनडीए सरकार पर जनविरोधी होने का लगातार आरोप लगाया जा रहा है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री का कहना है कि एनडीए सरकार सच्चे मायने में जनहितकारी है। यूपीए की पालिसी थी कि बड़ी कम्पनियों पर टैक्स लगाकर राजस्व जुटाया जाये और इसका उपयोग मनरेगाए इंदिरा आवास तथा किसानों की ऋण माफी जैसी योजनाओं पर किया जाये। इस स्ट्रेटजी में समस्या थी कि बड़ी कम्पनियों द्वारा आटोमेटिक मशीनों का उपयोग किये जाने से रोजगार उत्पन्न नहीं हो रहे थे। इससे मनरेगा जैसी योजनाओं पर दबाव बढ़ रहा था। दूसरी समस्या थी कि इन योजनाओं में भ्रष्टाचार पनप रहा थाए जिसके कारण रकम लाभार्थी तक कम ही पहुंच रही थी।
इन समस्याओं को दूर करने के लिये एनडीए सरकार ने सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रमों को छोटा करने और निजी उद्यमों द्वारा रोजगार सृजन की स्ट्रेटजी को अपनाया है। वित्त मंत्री ने कम्पनियों पर लागू कार्पोरेट इनकम टैक्स की दर को वर्तमान 30 प्रतिशत से घटा कर अगले चार वर्षों में 25 प्रतिशत पर लाने की घोषणा की है। वित्त मंत्री को आशा है कि देशी और विदेशी कम्पनियां भारत में निवेश करेंगी। इस निवेश से रोजगार उत्पन्न होंगे। इन कम्पनियों से वसूली गई टैक्स की रकम से मनरेगा जैसी योजनाओं पर खर्च करने की जरूरत ही नहीं रह जायेगी।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए कार्पोरेट टैक्स की दर को घटाना जरूरी भी था। वैश्वीकरण के इस युग में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां मेजबान देश में लाभ कमाकर अपने देश स्थित मुख्यालय को प्रेषित कर देती हैं। प्रश्न है कि इस लाभ पर आयकर कहां अदा किया जायेघ् भारत ने तमाम देशों के साथ डबल टैक्सेशन अवायडेन्स एग्रीमेंट कर रखे हैं। अलग.अलग एग्रीमेंट में अलग.अलग व्यवस्था रहती है कि आयकर मेजबान देश में अदा किया जायेगा अथवा घरेलू देश में। बहरहाल इतना स्पष्ट है कि मुख्यालय के भारत में स्थापित होने से हम आयकर अधिक मात्रा में वसूल कर सकेंगे। इस समय आरसेलर मित्तल तथा टाटा कोरस जैसी भारतीय कम्पनियां अपने मुख्यालय दूसरे देश में स्थापित करके भारत में कमाये गये लाभ पर आयकर दूसरे देश में अदा कर रही हैं जहां कार्पोरेट टैक्स की दर कम है। कार्पोरेट टैक्स घटाकर वित्त मंत्री ने इन्हें भारत में आयकर अदा करने का प्रोत्साहन दिया है जो सही दिशा में उठाया गया कदम है।
कार्पोरेट टैक्स घटाने से तत्काल टैक्स की वसूली कम होगी। आने वाले समय में यदि भारी मात्रा में निवेश आया तो टैक्स की वसूली पुनः बढ़ सकती है। तत्काल वसूली कम होने से जनकल्याणकारी योजनाओं पर वित्तमंत्री को व्यय कम करना पड़ा है। जैसे मनरेगा को गत वर्ष की भांति मात्र 34ए000 करोड़ का आवंटन किया गया है जबकि गत वर्ष के स्तर को बनाये रखने के लिये इसमें महंगाई के बराबर वृद्धि करना जरूरी था। आवंटन को न बढ़ाकर वित्त मंत्री ने इस योजना पर व्यय में कटौती की है। इस कटौती की भरपाई गरीब के लिये बीमा जैसी योजनाओं द्वारा दिखाने का प्रयास किया गया है परन्तु इन नई योजनाओं के लिये सूक्ष्म मात्रा में धन का आवंटन किया गया है। मूल रूप से वित्त मंत्री ने जनकल्याणकारी योजनाओं पर खर्च में कटौती की है।
भारी मात्रा में निवेश आ जाये तो भी आम आदमी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगाए यह संदिग्ध रहता है। कारण कि बड़ी कम्पनियों के द्वारा आटोमेटिक मशीनों से उत्पादन किया जाता है। इससे रोजगार का हनन होता है। सलाहकारी कम्पनी क्रिसिल द्वारा किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि एक करोड़ रुपये का उत्पादन करने के लिये वर्ष 2005 में 171 श्रमिकों की जरूरत पड़ती थी। वर्ष 2010 में यह घटकर 105 रह गई थी। मैन्यूफेक्चरिंग सेक्टर में रोजगार में सात प्रतिशत की कटौती हुई। इस अवधि में हमारी औसत विकास दर 8ण्4 प्रतिशत पर ऊंची थी। यानी भारी मात्रा में निवेश और तीव्र विकास दर के बावजूद रोजगार का हनन हुआ। अतः यदि कार्पोरेट टैक्स में कटौती के कारण भारी मात्रा में निवेश आया तो रोजगार हनन की गति भी तीव्र हो जायेगी।
वित्त मंत्री चाहते हैं कि कम्पनियों को आकर्षित करके निजी क्षेत्र में ज्यादा संख्या में रोजगार उत्पन्न हो तथा कार्पोरेट टैक्स वसूल करके जनकल्याणकारी योजनाओं के लिये राजस्व जुटाने की जरूरत ही नहीं रह जाये। बाजार में 300 रुपये की दिहाड़ी मिल रही हो तो 150 रुपये में मनरेगा में काम करने कौन आयेगाघ् लेकिन बड़ी कम्पनियों द्वारा बड़ी मात्रा में निवेश किया जाये तो भी रोजगार उत्पन्न होना जरूरी नहीं है। यूपीए का अनुभव हमारे सामने है। 6.8 प्रतिशत सम्मानजनक विकास दर के बावजूद बड़े उद्योगों द्वारा रोजगार कम ही सृजित किये गये। यही कारण है कि मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं के बावजूद यूपीए को जनता ने नकार दिया। यूपीए कार्यकाल में बड़ी कम्पनियों के द्वारा पहले आटोमेटिक मशीनों से उत्पादन करके रोजगार का हनन किया गया। इससे बेरोजगारी बढ़ी। फिर इन्हीं कम्पनियों से टैक्स वसूल करके इनके ही द्वारा बनाई गई बेरोजगारी से राहत देने के लिये जनकल्याणकारी योजनायें चलायी गई। इसी आत्मघाती पालिसी को वित्त मंत्री श्री जेटली मुस्तैदी से लागू करना चाह रहे हैं लेकिन इस स्ट्रेटजी के सफल होने की संभावना शून्य है।

वित्त मंत्री को चाहिये कि देश में श्रम सघन उत्पादन को प्रोत्साहन देंए जैसे टैक्सटाइल मिल पर टैक्स बढ़ाकर हैंडलूम तथा पावरलूम को संरक्षण दें। पूंजी सघन मशीनों से उत्पादित सस्ते कपड़े पर आयात कर बढ़ायें। ऐसा करने से रोजगार सृजन होगा और जनकल्याणकारी योजनाओं की जरूरत ही नहीं रह जायेगी। लेकिन ऐसा करने से कार्पोरेटों की स्वच्छन्दता समाप्त हो जायेगी।
SOURCE : http://dainiktribuneonline.com/2015/06/

स्मृतियों व संबल के प्रति कृतज्ञता

स्मृतियों व संबल के प्रति कृतज्ञता

किसी की प्रशंसा करने का फायदा यह होता है कि व्यक्ति इसमें चीजों को अपने मनमाफिक सुव्यवस्थित करने को स्वतंत्र होता है। सेमुअल बटलर ने अपने लगभग आत्मकथात्मक उपन्यास.ष्दि वे ऑफ ऑल फ्लैसष् में इस दृष्टांत का उल्लेख किया है। यही बात हमारी स्मृतियों पर लागू होती हैए जहां हम अपने जीवन की मधुर स्मृतियों को याद करते हैं और अप्रिय और दुखद बातों का उल्लेख करने से बचते हैं। दि ट्रिब्यून की बागडोर थामने के दौरान पांच साल के जीवंत घटनाक्रम के बीच जब मैंने पद छोड़ा है तो यादों को ताजा करने की अनुमति आप लोगों से चाहूंगा।
इस महत्वपूर्ण दायित्व को दिये जाने के घटनाक्रम को याद करता हूं। मार्च 2010 में जब मैंने पदभार ग्रहण किया तो पंजाब के पूर्व चीफ सेक्रेटरी स्वण् आरण्एसण् तलवार तब दि ट्रिब्यून ट्रस्ट के प्रेजीडेंट थे। उन्होंने सिर्फ एक पंक्ति कही थीकृष्दि ट्रिब्यून की स्वतंत्रता को संभालिए और पत्रकारिता की गरिमा को बनाये रखिए।ष् यह किसी संपादक को दिये जाने वाले दायित्वों की सर्वोत्तम परिभाषा थी।
कार्यालय में पहले सप्ताह के दौरान ही मैंने महसूस किया कि इस क्षेत्र में दि ट्रिब्यून को कितना प्यार मिलता है और इसके प्रति कैसा श्रद्धा भाव है। पंजाब के तत्कालीन वित्तमंत्री मनप्रीत सिंह बादल ने मुझसे कहा कि दि ट्रिब्यून उनके लिए मां के दूध के समान है जिसको पढ़ते हुए वे बड़े हुए हैं। अब चाहे शक्तिसंपन्न तबका हो या आम आदमीए अमीर हो या गरीबए हाई हील वाले हों या चप्पल वालेए उनके लिए यह महज अखबार ही नहीं थाए यह उनके परिवार के सदस्य जैसा थाए कई पीढ़ियों से।
कई वरिष्ठ अधिकारियों ने बेझिझक स्वीकार किया कि उन्होंने दि ट्रिब्यून को पढ़ते हुए अंग्रेजी सीखी है। अखबार के कई पाठकों ने बताया कि उन्होंने अपनी एलबमों में उन कतरनों को लगाया हुआ है जिनमें उनकी बोर्ड की परीक्षा के परिणाम व नाम प्रकाशित हुए थे। कुछ ऐसे थे जिन्होंने स्कूल.कालेजों के यादगार पलों को दर्ज करने वाली कतरनों को दस्तावेज के रूप में संभाल कर रखा हुआ था। ऐसे विरले ही मौके सामने आए जब गुस्सा नजर आया हो। एक गोल्फर ने मैदान में मुझसे कहा कि आज से दस साल पहले पत्र में छपी खबर में तथ्यात्मक त्रुटि थी।
पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने मुझसे कहा कि वे बीते वर्षों के अखबार की कतरनों को क्रमबद्ध रूप से रखते हैं। सुबह अखबार पढने के बाद व्यक्तिगत रूप से अधिकारियों को उनके विभाग से जुड़ी खबरों पर एक्शन लेने को कहते हैं। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने मुझे बताया कि तब तक उनकी सुबह अधूरी होती है जब तक वे दि ट्रिब्यून न पढ़ लेंं।
ऐसे भी कई मौके आए हैं जब ये लोग सत्ता में होते हैं तो वे दि ट्रिब्यून में प्रकाशित समाचारों को पसंद नहीं करते और मुझसे शिकायत करते थे। मेरा मुख्य ध्येय यही रहता था कि कोई तथ्यात्मक त्रुटि न हो और खबर निष्पक्ष व संतुलित हो। यदि ऐसा नहीं पाया गया तो उसमें फिर सुधार भी किया गया। अन्यथा हम स्पष्ट थे कि कोई हम पर खबर प्रकाशन में अवरोध का दबाव न बना सके। इस बाबत निर्णय हमारा होता था और सिर्फ हमारा। जिसका आधार प्राथमिकता होती थी। हम अपने लेखन का महत्व समझते थे और यह जानते थे कि यह कैसे लोगों के जीवन को प्रभावित करता हैए यहां तक कि उनके भविष्य को। हमने इस बात के लिए श्रमसाध्य प्रयास किये कि हम पत्रकारिता के उच्च मानदंडों का अनुपालन करें। हमने यह निर्णय पाठकों पर छोड़ा कि वे तय करें कि हमारे तीन सौ रिपोर्टरों द्वारा प्रतिदिन लिखे जाने वाले पांच लाख शब्दों द्वारा ऐसा किया जा सका।
विगत के मुकाबले अब ई.मेल व मोबाइल के जरिये पाठक सहजता से संपादकों से संवाद स्थापित कर पा रहे हैं। मुझे वक्त.बेवक्त फोन से चोरी और अधिकारियों द्वारा परेशान किये जाने की शिकायत मिलती रहती थी। कई कॉल सरकारी और कॉरपोरेट सेवाओं में खामियों को इंगित करती थी। वे चाहते थे कि दैनिक जीवन में दरपेश आने वाली समस्याओं को ट्रिब्यून उठाये। उस समय मैं एक डॉक्टर या पुलिसकर्मी की भांति चौबीसों घंटों उनकी बात सुनता था। मैं दि ट्रिब्यून के प्रति उनके विश्वास के चलते ऐसा करता रहा। दरअसल दि ट्रिब्यून और हमारा मिशन यही रहा है कि यह लोगों की आवाज बने।

राज चेंगप्पा
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मेरे इस कार्यकाल ने मुझे अपनी जड़ें पुनरू तलाशने का मौका दिया। मेरा जन्म फिरोजपुर में हुआ था और मैंने पंजाब तब छोड़ दिया था जब मैं चार वर्ष का था। पचास साल बाद जब मैंने दि ट्रिब्यून ज्वॉइन किया तो मैंने अपना जन्म स्थान देखने की इच्छा जाहिर की। मैंने अपने साथ अपने बेटे को लिया और उस एयरफोर्स हॉस्पिटल में गया जहां मेरा जन्म हुआ था। मैंने अस्पताल के बाहर खड़े होकर बंगलूरू में रहने वाली मां को फोन लगाया। हालांकि उम्रदराज मां स्मृतिह्रास के चलते पुरानी बातों को याद नहीं कर पाईं। बावजूद इसके यह मेरे लिए भावनात्मक क्षण था। इस बात को एक मां और उसका बेटा ही महसूस कर सकते थे। यह कई मायनों में पुत्तर की वापसी थी।
इस यात्रा के दौरान मैंने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में श्रद्धा व्यक्त की और शांति की धारा को महसूस किया। मैं हरमंदिर साहेब के प्रथम तल पर बैठा और श्रद्धा में अभिभूत हो आंखें बंद कर लीं। उन क्षणों में मैंने खुद को सृष्टि के साथ एकाकार महसूस किया। मैने गुरु नानक देव के आध्यात्मिक संदेशकृएक ओंकार को समझा। इससे पहले मैं कई बार स्वर्ण मंदिर इस भाव को महसूस करने गया था। अब जब मैं नये दायित्वों का निर्वहन करूंगा तो दि ट्रिब्यून की सुखद अनुभूतियां मेरे साथ रहेंगी। मैं अपने साथ मानवता का महान संदेश लेकर जाऊंगा। आपके धैर्य के लिए आभार।
SOURCE : http://dainiktribuneonline.com/2015/06/

Monday, 1 June 2015

मौसम के मारक तेवरों को समझें

मौसम के मारक तेवरों को समझें

गर्मियां हर साल आती हैं और पारा हर साल 45 तक तो पहुंचता ही है। मगर ऐसा कभी नहीं देखा गया कि समुद्र तटवर्ती आंध्र और तेलंगाना में डेढ़ हजार लोग जान गंवा बैठें। गर्मियां आमतौर पर पुरवा हवा वाले राजस्थानए हरियाणाए पंजाब व यूपी को ही परेशान किया करती थीं पर उन इलाकों में इतनी भीषण गर्मी का पहुंचना असंभव माना जाता था जहां आर्द्रता साठ परसेंट के ऊपर रहती हो। लेकिन इस बार गर्मी व लू की मार से सबसे ज्यादा समुद्र तटवर्ती इलाके के लोग तड़पे। सरकार ने कभी इस बात पर विचार नहीं किया कि क्यों आखिर गर्मी हर साल अपना समयए इलाका और मारक क्षमता बढ़ाती जा रही है। यह मौसम चक्र का ही बदलाव है कि सर्दी अब दीवाली से नहीं बल्कि दीवाली के महीने भर बाद शुरू होती है। एक जमाने में दीवाली की रात से ही रजाई निकल आया करती थी और होली तक ओढ़ी जाती थी। पर अब मौसम चक्र बदलने के चलते हो यह गया है कि दीवाली के एक महीने बाद रजाई ओढ़नी शुरू की जाती है और होली तो दूरए अप्रैल के पहले हफ्ते तक यह आसानी से ओढ़ी जाती है। अब जुलाई में वर्षा नहीं होती और सितंबर के आखिरी हफ्ते में बाढ़ आती है। यह संकेत है कि मौसम निरंतर बदल रहा है। कभी पश्चिमी विक्षोभ के चलते तो कभी पूर्वी समुद्र में आए तूफान के चलते। यानी भारत में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों ने ही अपने स्वरूप बदल लिए हैं। अरब सागर आमतौर पर शांत माना जाता है और उथला होने के कारण इसके अंदर वैसा ज्वार नहीं उठता जैसा कि बंगाल की खाड़ी से। भारत में चूंकि इन्हीं दोनों समुद्रों का ही साबका पड़ता हैए इसलिए इस पर शोध होना चाहिए कि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में निरंतर क्या.क्या परिवर्तन हो रहे हैं।
बंगाल की खाड़ी अपने तटवर्ती इलाकों में सर्वाधिक आर्द्रता उत्सर्जित करती है। इसलिए जब भी सूरज का ताप बढ़ता है वहां पर लू और हीट स्ट्रोक की मार सर्वाधिक पड़ती है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। साल 1999 में याद करिए भुवनेश्वर में इतनी ज्यादा गर्मी पड़ी थी कि तब वहां पर लू से मरने वालों की संख्या 500 तक पहुंच गई थी। दूसरे लू की मार की एक वजह यह भी है कि जिन इलाकों में लू चलती है वहां के लोग गर्मी से निपटने को तैयार रहते हैं पर जहां पुरवा नहीं बहती वहां के लोग इससे बचने के उपाय से भी अनजान रहते हैं। खूब पानी पीना उन इलाकों में तो संभव है जहां का मौसम खुश्क है और जहां प्यास लगती ही है पर समुद्र तटीय इलाकों में लोग प्यास महसूस ही नहीं करते। यही कारण है कि आंध्र और तेलंगाना में 1800 लोग काल.कवलित हो गए। राजस्थान के रेतीले इलाके और दोआबे में बसे हुए लोगों को गर्मी से निपटने के उपाय भी पता होते हैंए इसलिए वे तरबूज.खरबूजा और आम के पने का सेवन तो करते ही रहते हैंए साथ में खूब पानी पीते हैंए तली.भुनी चीजें नहीं खाते और प्याज का सेवन निरंतर करते हैं। मगर तटीय लोग इससे अनजान होते हैं।
भारत में आमतौर पर माना जाता है कि जिस साल गर्मी खूब पड़ेगीए उस साल बारिश भी खूब होगी। दिल्ली समेत उत्तर भारत में गर्मी का यह मौसम मई के आखिरी हफ्ते से शुरू होकर दस जून तक चलता है जब गर्मी जबरदस्त पड़ती है और पारा 45 पार कर जाता है। मगर सुदूर तटीय इलाकों में पारा बढ़ने के ऐसे संकेत नहीं मिलते हैं। वहां पारा 35 से 48 के बीच रहकर भी आफत मचा देता है और उसकी वजह वहां के मौसम में नमी का प्रतिशत है। नमी अगर साठ पार कर गई तो बढ़ता पारा काल बन जाता है। और इसी वजह से आंध्र और तेलंगाना में इतनी मौतें हुईं। इसका सीधा.सीधा मतलब यह हुआ कि तटवर्ती इलाकों में पारे की यह बढ़ोतरी एक खतरनाक संकेत है और इस पर गंभीरतापूर्वक मनन करना चाहिए। समुद्र का पानी धूप को मारक तो बनाता है पर पारे पर कंट्रोल रखता है। मगर जब पारा बढ़ेगा तो जाहिर है आर्द्रता अधिक होने के कारण वहां पसीना खूब बहेगा और यह पसीना शरीर में पानी को कम कर देगा। यही डिहाइड्रेशन की वजह है। आर्द्रता पसीना तो निकालती है पर प्यास नहीं बढ़ातीए जिसकी वजह से आदमी पानी नहीं पीता और अधिक पसीना निकल जाने से उसकी मौत हो जाती है। इसके विपरीत रेतीले और दोआबी मैदानों में पुरवा के कारण पसीना नहीं आता और आर्द्रता नहीं होने से पसीना नहीं निकलता जिसके कारण यहां उस तरह से गर्मी न तो विकल करती है और न मारक होती है।
अभी नेपाल में आए भूकम्प के झटकों से यह तो साफ हो ही गया कि धरती के नीचे काफी कुछ बदल रहा है और इसकी वजह हमारी प्राकृतिक संसाधनों से छेड़छाड़ है। यह जो सुनामीए अल नीनोए कैटरीना और रीटा आदि तूफान तबाही मचाने आते हैंए इन सबकी वजह यही छेड़छाड़ है। प्रकृति ने सब को समान रूप से संसाधन मुहैया कराये हैं। उसमें अकेले मनुष्य ही नहीं बल्कि समस्त जीव.जंतु हैं। पर चूंकि जीवधारियों में मनुष्य के पास ही दिमाग हैए इसलिए उसने प्रकृति के सारे संसाधनों पर पहले तो खुद कब्जा किया फिर मनुष्य को जातिए धर्म व समुदाय तथा राष्ट्र.राज्य की सीमाओं में बांधकर सबसे ताकतवर ने अन्य संसाधनों पर ही कब्जा किया। लेकिन यह खेल खतरनाक तो होना ही था। संसाधनों पर कब्जा कर लेने से प्रकृति का कुपित होना स्वाभाविक है और प्रकृति का कोप ही है जो कभी गर्मी के रूप मेंए कभी अतिवृष्टि के रूप में तो कभी अतिशीत के रूप में दिखाई पड़ता है। अाध्यात्मिक चिंतन हमें एक न्यायसंगत जीवन जीने और प्रकृति के सभी जीवधारियों के प्रति समान व्यवहार करने की प्रेरणा देता है लेकिन जब जीवन की आपाधापी में अध्यात्म चुक जाए तो इस तरह के कोप को अत्यधिक उपभोग से तो नहीं टाला जा सकता।
SOURCE : http://dainiktribuneonline.com/2015/05/

चर्म नहींए मर्म के गुण बांचिए

चर्म नहींए मर्म के गुण बांचिए

समाज में एक बहुत बुरी प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती जा रही है। वह है किसी का भी उपहास करने की अशोभन प्रवृत्ति। जरा.सा किसी को लंगड़ाते हुए या अनायास फिसल कर गिरते देख कर आदमी उपहास करते हैं और ऐसे व्यक्ति का मज़ाक उड़ा कर स्वयं को बहुत ष्बड़ा बुद्धिमानष् मानते हैं। कौन ऐसा हैए जिसमें कोई दुर्बलता या कोई कमी नहीं होतीघ् यह वह महत्वपूर्ण प्रश्न हैए जो महान दार्शनिक अष्टावक्र ने अपना उपहास करते हुए राजा जनक की सभा में उपस्थित समस्त विद्वानों से पूछा था।
भारतीय पुराणों में कथा है कि अष्टावक्र जब ष्गर्भष् में थेए तभी उन्हें वेदों का बोध हो गया था। वे महान दार्शनिक और शास्त्रों के ज्ञाता थे तथा जहां भी शास्त्रार्थ करते थेए विजयी होते थे। मिथिला के राजा जनक तो उन्हें अपना ष्गुरुष् ही मानते थे।
एक बार की बात है कि राजा जनक के दरबार में बड़े.बड़े विद्वान शास्त्रार्थ के लिए एकत्र हुए। जब अष्टावक्र को यह ज्ञात हुआ तो वे भी राजा जनक की राजसभा में पहुंच गए। एक या दो नहींए पूरे आठ स्थानों की शारीरिक विकृतियां देखकर दरबार में बैठे सभासद बुरी तरह हंसने लगे और विकलांग अष्टावक्र का मज़ाक उड़ाने लगे। जब घोषणा हुई कि अष्टावक्र ष्शास्त्रार्थष् करने आए हैं तो दरबार में बड़े ही जोरों का ठहाका लगा। विद्वान अष्टावक्र अपने स्थान से उठकर जनक की राजसभा के बीचोंबीच जाकर खड़े हो गए और सबको देख कर हंसे। फिर गंभीर स्वर में बोलेकृहम तो समझते थे कि विदेहराज की राजसभा में ष्पंडितष् भी होंगेएलेकिन यहां तो सबके सब ष्चर्मकारष् ही निकले। अब क्या थाए सारी की सारी सभा दार्शनिक अष्टावक्र की ओर देखने लगी। तभी विनम्रता के साथ राजा विदेह ने पूछाकृभगवन! रुष्ट न हों। मुझे केवल यह बताइए कि आपने मेरी राजसभा में बैठे हरेक व्यक्ति को चर्मकार क्यों कहा हैघ् यहां तो अनेक विद्वान और शास्त्रज्ञ बैठे हुए हैंघ् कृपा करके आप चर्मकार कहने का अभिप्राय तो मुझे अवश्य बताएं।
विदेहराज जनक की बात सुनकर अष्टावक्र ने अत्यंत धीर और गंभीर वाणी में जीवन का तत्व बताते हुए कहा.महाराज जनक! सभी जानते हैं कि ष्आत्माष् नित्य हैए शुद्ध.बुद्ध हैए निर्लेप हैए अनश्वर और निर्विकार है। इसका अर्थ यही तो है कि प्रत्येक व्यक्ति की ष्आत्माष् पूर्णतः निर्विकार हैए उसमें कोई विकार या दोष हो ही नहीं सकता। जो ष्आत्माष् सब में हैए वही तो मुझ में भी है। जो भी व्यक्ति इस ष्ब्रह्म सत्यष् को जानता हैए वही ज्ञानी हैएपंडित हैएशास्त्रज्ञ और विद्वान है। जिसे इस निर्विकार ष्आत्माष् की ही पहचान नहींएबल्कि जो ष्चर्मष् से ढके हुए इस ष्अस्थि.मांसष् के शरीर को देख कर हंसता हैए उसे भला आत्मा का बोध कहां हो सकता हैघ् राजन! ऐसे व्यक्ति को तो केवल चर्म का ही बोध होता है। इसीलिए मैंने यहां उपस्थित हुए सभी को चर्मकार कहा है। बताइएए क्या ऐसा कहना सही नहीं हैघ्
राजा जनक की पूरी राजसभा में सन्नाटा छा गया और विद्वानों के सिर शर्म से झुक गए। तब अष्टावक्र फिर से बोलेकृराजन! मुझे तो इन विद्वानों की बुद्धि देख कर हंसी आई थी कि जो लोग आत्मा जैसे विषय पर शास्त्रार्थ करने आए हैंए उन सबका ध्यान तो मेरी चमड़ी पर ही अटका हुआ है। ये शास्त्रों के ज्ञाता तो हो ही नहीं सकते। राजा जनक अपने सिंहासन से उतर कर आए और उन्होंने अष्टावक्र की चरण.वंदना करके आशीर्वाद लिया।
ऐसा ही प्रेरक प्रसंग हिंदी के भक्त कवि मलिक मुहम्मद जायसी के जीवन का भी हैए जो आज की युवा पीढ़ी के लिए वरदान और प्रेरणा का स्रोत हो सकता है। एक बार शेरशाह सूरी ने प्रशंसा सुनकर महाकवि जायसी को राजदरबार में बुलाया। जायसी आए तो बादशाह सूरी उनकी एक आंख ष्बंदष् देखकर हंस पड़ा। जायसी ने उसी समय दो पंक्तियां रचीं और शेरशाह सूरी को सुना दीकृ
मो कंह हंससीघ् कि कोहरहींघ्
अर्थात.हे राजा! मुझ पर हंस रहा है या कुम्हार पर हंस रहा हैघ् मुझे जिस कुम्हार यानी खुदा ने बनायाए यह गलती तो उसकी है कि मेरी ष्एक आंखष् फूटी हुई बना दी है। शेरशाह भरी सभा में लज्जित हुआ था।
समाज में ष्विकलांगोंष् को देखकर जब भी कोई हंसता है या उनका मज़ाक उड़ाता हैए तो इस मार्मिक बोध कथा का ष्एकष् शब्द चर्मकार याद आता है और अंतर्मन विचारता है कि कब आदमी चर्म के नीचे छिपे ष्अस्थि.मांसष् को छोड़करए आदमी की आत्माए विद्वत्ता और ज्ञान की परख करना सीखेगाघ् वास्तव में हम अपनी युवा पीढ़ी को ऐसी बोध.कथाओं का अमृत अवश्य देंए जिससे आने वाला व्यक्ति चर्मकार न होकर आत्मा के निर्विकार रूप की कद्र करना सीख सके। याद रखिएए किसी का उपहास करने वाला अपनी ही दुर्बलता को व्यक्त करता है।
SOURCE : http://dainiktribuneonline.com/2015/05/